इस्लामाबाद में आमने-सामने अमेरिका और ईरान: क्या शांति वार्ता से थमेगा मिडिल ईस्ट का संघर्ष?
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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद आज (11 अप्रैल) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कूटनीतिक घटनाक्रम का गवाह बनने जा रही है। वर्षों के तनाव और संघर्ष के बाद, अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल शांति वार्ता के लिए एक मंच पर जुट रहे हैं। इस बैठक को मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।

ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व और शर्तें ईरान का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर कलीबाफ के नेतृत्व में इस्लामाबाद पहुंच चुका है। इस टीम में विदेश मंत्री अब्बास अराघची, रक्षा परिषद के वरिष्ठ अधिकारी और केंद्रीय बैंक के गवर्नर जैसे दिग्गज शामिल हैं। ईरान ने वार्ता की मेज पर स्पष्ट शर्तें रखी हैं। इनमें आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, जब्त संपत्तियों की वापसी और क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा शामिल है।

अमेरिकी खेमे की तैयारी दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कर रहे हैं। उनके साथ विशेष दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ भी मौजूद हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच दशकों पुराना अविश्वास अब भी कायम है। हाल के दिनों में एक-दूसरे पर युद्धविराम के उल्लंघन के तीखे आरोपों ने इस बैठक की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।

लेबनान का मुद्दा बना सबसे बड़ी बाधा इस वार्ता की राह में सबसे बड़ी चुनौती लेबनान का मुद्दा है। ईरान ने अपनी स्थिति साफ कर दी है कि जब तक लेबनान (जहां हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच भीषण संघर्ष जारी है) को युद्धविराम में शामिल नहीं किया जाता, तब तक वह बातचीत को आगे नहीं बढ़ाएगा। इजराइल ने पूर्व में इस शर्त को खारिज किया है, जिससे वार्ता के विफल होने का खतरा बना हुआ है।

होर्मुज स्ट्रेट पर गहरा मतभेद वार्ता का एक और पेचीदा अध्याय होर्मुज स्ट्रेट है। ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपना नियंत्रण चाहता है और जहाजों से शुल्क वसूलने की मांग कर रहा है। अमेरिका इसे सिरे से खारिज कर रहा है। इसके साथ ही, अमेरिका की प्राथमिकता ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कराना है।

डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि यह बातचीत आसान नहीं होगी। उन्होंने ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें बातचीत के लिए ही जीवित रखा गया है। व्हाइट हाउस का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाना लगभग नामुमकिन है।

क्या निकलेगा कोई ठोस नतीजा? इस्लामाबाद में हो रही यह बैठक उम्मीदों और अनिश्चितताओं के भंवर में फंसी है। यदि दोनों देश अपनी पुरानी शर्तों पर अड़े रहे, तो यह ऐतिहासिक वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हो सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति युद्ध को रोक पाएगी या क्षेत्र में तनाव और गहरा जाएगा।

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