ऑरवेलियन डिस्टोपिया का खतरा: NSA मामले में 5 लाख के हर्जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं नोएडा DM
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गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि यह राशि डीएम के निजी वेतन से काटी जानी चाहिए।

क्या है पूरा मामला? अप्रैल 2026 में नोएडा में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था। 13 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस ने आकृति और कार्यकर्ता सत्यम वर्मा पर एनएसए (NSA) के तहत कार्रवाई की। आकृति उन कार्यकर्ताओं में शामिल थीं जो शांतिपूर्ण तरीके से बेहतर वेतन की मांग कर रहे थे।

हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच ने आकृति की हिरासत को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करार दिया। अदालत ने हिरासत के आदेश को बिना सोचे-समझे और आधारहीन बताया। कोर्ट ने नोएडा डीएम की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा कि अधिकारियों का मनमाना रवैया उत्तर प्रदेश को ऑरवेलियन डिस्टोपिया (एक ऐसा समाज जहाँ दमनकारी शासन हो) में बदल सकता है।

अधिकारियों के वेतन से वसूली का आदेश हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि छात्रा को दिए जाने वाले 5 लाख रुपये के मुआवजे की भरपाई डीएम मेधा रूपम और मामले में शामिल एसएचओ के वेतन से की जाए। अदालत का तर्क था कि अधिकारियों को मिली व्यापक शक्तियां नागरिकों के कल्याण और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए हैं, न कि तानाशाही के लिए।

नौकरशाही के लिए सबक अदालत ने कहा, महान शक्तियों के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि नौकरशाहों को इस बात पर आत्ममंथन करना चाहिए कि वे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किस सीमा तक कर रहे हैं। अदालत के अनुसार, राज्य में कानून का शासन इसी बात से तय होता है कि एक अधिकारी नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में डीएम की याचिका पर क्या रुख अपनाता है। यह मामला भविष्य में प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और उनके शक्ति के दुरुपयोग को लेकर एक बड़ा कानूनी नजीर साबित हो सकता है।

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