अमेरिका की विदेश नीति पर उठा सवाल: ब्रिक्स समिट में रूस, चीन और ईरान की बढ़ती नजदीकी ने दी चेतावनी
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नई दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। इस समिट से सामने आईं तस्वीरें, विशेष रूप से रूस, चीन और ईरान के विदेश मंत्रियों की एकजुटता, अब चर्चा का विषय बन गई है।

कूटनीति में नई धुरी का उदय शिखर सम्मेलन के दौरान रूस के व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी के बीच, रूस, ईरान और चीन के विदेश मंत्रियों की गलबहियां डालती तस्वीरें वैश्विक सुर्खियों में हैं। यह दृश्य उन देशों के लिए चिंता का संकेत है जो इन तीनों को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम कर रहे थे।

अमेरिकी विशेषज्ञ की कड़ी टिप्पणी अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मारियो नवफल ने इस घटनाक्रम को वाशिंगटन की विफलता बताया है। नवफल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि अमेरिका की विदेश नीति का मूल उद्देश्य अपने प्रतिद्वंद्वियों को अलग-थलग करना था। लेकिन, हकीकत में यह नीति इन देशों को एक-दूसरे के और करीब ला रही है।

क्या अमेरिका खो रहा है अपना दबदबा? नवफल ने अपनी पोस्ट में एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि, अगर दुनिया किसी बड़े विनाश या एआई (AI) के खतरे से बच गई, तो आने वाली पीढ़ियां इस दौर को उस समय के रूप में देखेंगी, जब अमेरिका ने प्रमुख महाशक्ति के रूप में अपना दर्जा खोना शुरू किया था। उनके अनुसार, अमेरिका की वर्तमान विदेश नीति का उल्टा असर हो रहा है।

वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव ब्रिक्स समिट में भारत की कूटनीतिक सक्रियता और नई दिल्ली घोषणापत्र को मिली सर्वसम्मत मंजूरी ने एक संदेश दिया है कि दुनिया अब केवल एक महाशक्ति के इशारे पर नहीं चलने वाली। रूस, ईरान और चीन का एक खेमे में दिखना यह साबित करता है कि आर्थिक और राजनीतिक दबाव के बावजूद नए गठबंधन आकार ले रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स का विस्तार और सदस्य देशों के बीच गहराता विश्वास आने वाले समय में पश्चिमी देशों के लिए बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती साबित हो सकता है। फिलहाल, वाशिंगटन के थिंक टैंकों के लिए यह मंथन का विषय है कि उनकी आइसोलेशन पॉलिसी (अलग-थलग करने की नीति) आखिर क्यों एलायंस बिल्डिंग (गठबंधन बनाने) में बदल गई।

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