हम बचपन से जिस दुनिया के नक्शे को देखकर बड़े हुए हैं, वह असल में एक बड़ा धोखा है। इस नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका लगभग बराबर दिखते हैं, जबकि हकीकत में अफ्रीका, ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। यह अंतर महज एक छोटी भूल नहीं, बल्कि 450 साल पुरानी एक तकनीक का परिणाम है।
1569 में जेरार्डस मर्केटर ने यह नक्शा बनाया था। इसका उद्देश्य देशों का सही आकार दिखाना नहीं, बल्कि समुद्र में दिशा और रास्ता पहचानना था। गोल धरती को सपाट कागज पर उतारने के लिए उन्होंने भूमध्य रेखा से दूर के हिस्सों को खींचकर बड़ा कर दिया। इसी कारण उत्तर और दक्षिण ध्रुवों के पास के देश और द्वीप अपनी असलियत से कहीं ज्यादा विशाल नजर आते हैं।
अफ्रीका का कुल क्षेत्रफल करीब 3.04 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इसमें अमेरिका (9.83 मिलियन), चीन (9.6 मिलियन) और भारत (3.29 मिलियन) जैसे विशाल देशों को एक साथ समाने के बाद भी काफी जगह बच जाएगी। सालों तक स्कूली किताबों में अफ्रीका को छोटा और यूरोप को बड़ा दिखाने के पीछे इसे औपनिवेशिक मानसिकता से जोड़कर भी देखा जाता रहा है।
हाल ही में टोगो द्वारा पेश किए गए करैक्ट द मैप प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र में मतदान हुआ। 164 देशों ने इसका समर्थन किया, जिसका लक्ष्य इक्वल अर्थ (Equal Earth) जैसे नक्शों को बढ़ावा देना है, जो देशों के क्षेत्रफल को सही अनुपात में दिखाते हैं। हालांकि, यह किसी नक्शे पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि एक पहल है ताकि आने वाली पीढ़ी को दुनिया का सटीक आकार पता चल सके।
भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि इससे भारत की आधिकारिक सीमाओं या संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत के लिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे मुद्दों पर आधिकारिक सरकारी मानचित्र ही सर्वोपरि है।
सच तो यह है कि गोल धरती को सपाट कागज पर दिखाने का कोई भी नक्शा 100% सही नहीं हो सकता। किसी नक्शे में क्षेत्रफल सही होगा, तो किसी में दिशा। इसीलिए, समुद्री नेविगेशन के लिए मर्केटर आज भी उपयोगी है, तो वैश्विक समझ के लिए इक्वल अर्थ बेहतर है। धरती को उसके असली स्वरूप में देखने का एकमात्र सटीक जरिया आज भी ग्लोब ही है।
*Mercator Projection vs. Reality: The True Size of Every Country pic.twitter.com/cfjJPllQLD
— African Maps (@MapsAfrican) September 6, 2026
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