ट्रंप की धमकियों को ठेंगा: ईरान के साथ हाथ मिला भारत ने दिया स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी का कड़ा संदेश
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अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान पर लगातार दबाव बना रहा है। ट्रंप की चेतावनी साफ है—जो ईरान से डील करेगा, वह अमेरिका का दुश्मन माना जाएगा। लेकिन, इन धमकियों की परवाह किए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात कर कूटनीति के नए मायने गढ़ दिए हैं।

भारत का दो टूक संदेश बिश्केक में हुई इस मुलाकात ने दुनिया को स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब किसी एक महाशक्ति के दबाव में अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा। पीएम मोदी ने न केवल ईरान के साथ पुरानी दोस्ती दोहराई, बल्कि व्यापार बढ़ाने पर भी जोर दिया। यह कदम सीधे तौर पर वाशिंगटन को संकेत है कि भारत अपने नेशनल इंटरेस्ट (राष्ट्रीय हितों) के आगे किसी बाहरी दबाव को नहीं देखेगा।

क्यों अहम है ईरान के साथ रिश्ता? ईरान के साथ भारत के रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं हैं। चाबहार बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का एकमात्र वैकल्पिक रास्ता है। यदि भारत अमेरिका के डर से ईरान से दूरी बना लेता, तो चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर असर पड़ना तय था, जो सीधे तौर पर भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा और व्यापारिक सुरक्षा को नुकसान पहुंचाता।

अमेरिका बनाम भारत का स्वतंत्र रुख ईरान के साथ संबंध सुधारने का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत अमेरिका का दुश्मन बन गया है। भारत-अमेरिका के बीच रक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में गहरी साझेदारी है। हालांकि, भारत का यह कदम इस बात की पुष्टि करता है कि रणनीतिक स्वतंत्रता (Strategic Autonomy) भारत की विदेश नीति का आधार है। हम अमेरिका के साथ भी खड़े हैं और ईरान जैसे साझेदारों के साथ अपने आर्थिक हित भी साधेंगे।

ईरान ने की शांति की अपील मुलाकात के बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने तनाव कम करने की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान युद्ध नहीं चाहता और समस्याओं का समाधान बातचीत से संभव है। ईरान ने भारत से उम्मीद जताई है कि नई दिल्ली अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक भूमिका का इस्तेमाल करके शांति बहाली में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाए।

निष्कर्ष: दबाव के आगे झुकने से इनकार प्रधानमंत्री मोदी की यह मुलाकात एक संदेश है कि भारत दबाव की राजनीति को खारिज करता है। अगर आज ईरान पर लगे प्रतिबंधों के आगे भारत झुक जाता, तो भविष्य में यह दबाव अन्य अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी बढ़ता। भारत ने साफ कर दिया है कि वह स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर अपने आर्थिक और सामरिक फैसले खुद लेने में सक्षम है।

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