राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी एक डरावनी सच्चाई उजागर की है। उन्होंने डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच चल रहे रेफरल कमीशन या कट मनी के संगठित खेल पर तीखा हमला बोला है।
इलाज के नहीं, रेफर करने के मिलते हैं ₹3000 शून्यकाल के दौरान चड्ढा ने दावा किया कि चिकित्सा जगत में एक समानांतर इंसेंटिव इकोनॉमी काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ डॉक्टर मरीज का इलाज करने के बजाय उन्हें डायग्नोस्टिक सेंटर भेजने में अधिक रुचि रखते हैं, क्योंकि वहां से उन्हें 3,000 रुपये तक का कमीशन मिलता है।
मार्केटिंग खर्च के नाम पर मरीजों की लूट सांसद ने खुलासा किया कि डायग्नोस्टिक सेंटर इन कमीशन को अपनी फाइलों में मार्केटिंग एक्सपेंस दिखाते हैं, जबकि डॉक्टर इसे रेफरल कमीशन बताते हैं। इस अनैतिक लेनदेन का सारा आर्थिक बोझ अंततः मरीज की जेब पर पड़ता है, जिससे चिकित्सा बिल 15 से 20 प्रतिशत तक महंगे हो जाते हैं।
गैर-जरूरी जांचों का बढ़ रहा जाल इस व्यवस्था का सबसे बुरा असर यह है कि कमीशन के लालच में डॉक्टरों द्वारा मरीजों को गैर-जरूरी जांच (Tests) के लिए मजबूर किया जा रहा है। चड्ढा ने इसे एक गंभीर रेड फ्लैग करार दिया है और मरीजों से अपील की है कि वे ऐसी चीजों को लेकर जागरूक रहें।
क्या कहता है कानून? नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों के तहत फीस साझा करना या किसी भी तरह का रेफरल कमीशन लेना सख्त मना है। ऐसे मामलों में डॉक्टर के निलंबन तक का प्रावधान है। हालांकि, धरातल पर यह खेल आज भी फल-फूल रहा है।
सख्त कार्रवाई की उठी मांग चड्ढा के इस खुलासे के बाद चिकित्सा नैतिकता पर बहस फिर से तेज हो गई है। अब मांग उठ रही है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकार सख्त कदम उठाए और यह सुनिश्चित करे कि मरीजों का इलाज व्यावसायिक मुनाफे के बजाय केवल उनकी चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर हो।
In Parliament today, I spoke on the “cut money” arrangement between some doctors and diagnostic centres/ pathology labs.
— Raghav Chadha (@raghav_chadha) August 6, 2026
Diagnostic centres call it marketing expense. Doctors call it referral commission. All gets added to Patient s hospital bill.
A silent transaction that… pic.twitter.com/Fi2CCfyGfc
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