शुक्र है कि आत्मा को दर्द नहीं होता: पिता का अंतिम संस्कार देख रही थी बेटी, चेहरे पर शिकन तक नहीं
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सोनीपत के एक वृद्धाश्रम से आई खबर ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। 74 वर्षीय कपड़ा व्यापारी शिवचरण का निधन हो गया, लेकिन उनकी आखिरी इच्छा अधूरी रह गई। मरने से पहले वह बेटियों से मिलना चाहते थे, लेकिन अंतिम समय में बेटियाँ न आईं और न ही उनके जाने के बाद उनका चेहरा देखने की जहमत उठाई।

वीडियो कॉल पर देखा अंतिम संस्कार पिता के अंतिम संस्कार के दौरान एक बेटी ने वीडियो कॉल के जरिए सब कुछ देखा। रोंगटे खड़े कर देने वाली बात यह है कि उस दौरान बेटी के चेहरे पर दुख का भाव तक नहीं था। जब उसे अस्थि विसर्जन के लिए आने को कहा गया, तो उसने बड़ी बेरुखी से कहा, देखते हैं... अभी कितना समय लगेगा। बेटी ने केवल वीडियो भेजने की बात कही।

शिक्षित बेटियों का संवेदनहीन चेहरा हैरत की बात यह है कि शिवचरण की तीनों बेटियां शिक्षिका हैं, जो नेपाल, आजमगढ़ और मुंबई जैसे शहरों में तैनात हैं। एक बेटी ने तो हद ही कर दी, उसने संस्कार के लिए संस्था को ऑनलाइन 5100 रुपये भेज दिए और पल्ला झाड़ लिया। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पत्नी को खोने वाले शिवचरण अपनी बेटियों का इंतजार ही करते रह गए।

नेत्रदान कर गए शिवचरण भले ही बेटियां पिता के आखिरी वियोग में शामिल न हुईं, लेकिन शिवचरण ने जाते-जाते दो लोगों को नई रोशनी दे दी। उन्होंने मौत से पहले नेत्रदान का संकल्प लिया था, जिसे वृद्धाश्रम के संचालकों ने पूरा किया। उनके जाने के बाद उनकी आंखें अब दो लोगों की दुनिया रोशन करेंगी।

सोशल मीडिया पर फूटा लोगों का गुस्सा इस घटना ने सोशल मीडिया पर एक लंबी बहस छेड़ दी है। लोग बेटियों की संवेदनहीनता को देखकर आक्रोशित हैं। एक यूजर ने लिखा, शुक्र है कि आत्मा को दर्द नहीं होता, वरना इस उपेक्षा का दर्द उन्हें दोबारा मार देता। वहीं, लोग आधुनिक शिक्षा पर भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या डिग्री और पैसा इंसान को इतना निर्दयी बना देता है कि वह अपनों का मोह भी छोड़ दे।

समाज के लिए एक चेतावनी वृद्धाश्रम के संचालक आनंद के अनुसार, शिवचरण महाराष्ट्र के निवासी थे और तीन साल पहले पत्नी के साथ यहां आए थे। उनकी बीमारी की सूचना देने पर भी बेटियों ने समय न होने का बहाना बनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। यह घटना न केवल एक परिवार की विफलता है, बल्कि उस गिरते हुए सामाजिक ढांचे की भी बानगी है, जहां बुढ़ापा आज एक बोझ बनता जा रहा है।

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