थार का मॉडिफिकेशन पड़ा भारी: 4 लाख का बीमा क्लेम रिजेक्ट, आपकी एक गलती पड़ सकती है महंगी
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अगर आप भी अपनी कार को मॉडिफाई कराने के शौकीन हैं और सोचते हैं कि इंश्योरेंस प्रीमियम भर दिया है तो सब सुरक्षित है, तो यह खबर आपके लिए एक चेतावनी है। पंजाब के एक महिंद्रा थार मालिक का मामला सामने आया है, जहां छोटी सी लापरवाही के कारण उन्हें लाखों का नुकसान उठाना पड़ा।

क्या था पूरा मामला?

पंजाब के हरप्रीत सिंह ने 17.5 लाख रुपये में महिंद्रा थार खरीदी थी। उन्होंने शौक-शॉक में गाड़ी के लुक को पूरी तरह बदल दिया—हेडलाइट्स को ब्लैक पेंट किया, नई एलईडी लाइट्स लगवाईं, बोनट पर स्नोर्कल फिट कराया और पूरी बॉडी पर मैट ऑलिव कलर की रैपिंग करवाई।

दुर्भाग्य से, एनएच-44 पर उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। गाड़ी को 3.8 लाख रुपये का नुकसान हुआ। लेकिन जब उन्होंने बीमा कंपनी में क्लेम फाइल किया, तो कंपनी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

क्यों रिजेक्ट हुआ क्लेम?

बीमा कंपनी का तर्क स्पष्ट था। उनके अनुसार, एक्सीडेंट के बाद जो गाड़ी सर्वे के लिए पेश की गई, उसका हुलिया और तकनीकी विवरण पॉलिसी में दर्ज आंकड़ों से बिल्कुल अलग था। गाड़ी में किए गए बड़े बदलावों (मॉडिफिकेशन) की जानकारी कंपनी को कभी नहीं दी गई थी। नतीजतन, कंपनी ने पॉलिसी को वॉयड (अमान्य) करार दे दिया।

क्या कहता है बीमा कानून?

इंश्योरेंस एक्ट की धारा 64VB के तहत, अगर आप गाड़ी का स्वरूप या तकनीकी फीचर्स बदलते हैं और इसकी सूचना बीमा कंपनी को नहीं देते हैं, तो क्लेम मिलना लगभग नामुमकिन है। कोर्ट या कंज्यूमर फोरम भी ऐसे मामलों में बीमा कंपनी का ही पक्ष लेती है, क्योंकि यह सीधे तौर पर कॉन्ट्रैक्ट के नियमों का उल्लंघन है।

मॉडिफिकेशन से पहले क्या करें?

गाड़ी में बदलाव करना गलत नहीं है, लेकिन नियमों के दायरे में रहकर करना जरूरी है। क्लेम सुरक्षित रखने के लिए ये कदम उठाएं:

निष्कर्ष: अगली बार गाड़ी को कस्टमाइज कराते समय याद रखें कि आपका एक छोटा सा अपडेट आपकी पूरी पॉलिसी को कागज का टुकड़ा बना सकता है। जानकारी दें, सुरक्षित रहें।

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