स्कूलों में थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला का सच: क्या वाकई बच्चों पर थोपी जा रही हैं भाषाएं?
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भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शिक्षा प्रणाली हमेशा से चर्चा का विषय रही है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के लागू होने के बाद थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला (Three Language Formula) पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। आखिर यह फॉर्मूला क्या है और इसके पीछे की हकीकत क्या है?

क्या भाषा थोपी जा रही है?

अक्सर यह डर जताया जाता है कि सरकार बच्चों पर हिंदी या कोई खास भाषा थोप रही है। पूर्व NCERT निदेशक जे.एस. राजपूत का कहना है कि NEP 2020 में भाषा को थोपने का कोई प्रावधान नहीं है। यह पूरी तरह से राज्य, क्षेत्र और माता-पिता की पसंद पर निर्भर है। यदि कोई राज्य हिंदी नहीं पढ़ना चाहता, तो कोई भी उन्हें मजबूर नहीं कर सकता। राजपूत इसे नीति से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा मानते हैं।

नीति का मूल उद्देश्य और विफलता

इस फॉर्मूले का असली मकसद उत्तर भारत के बच्चों को दक्षिण की भाषाएं (जैसे तमिल, कन्नड़) और दक्षिण के बच्चों को उत्तर की भाषाएं सिखाना था, ताकि आपसी सांस्कृतिक समझ बढ़े। हालांकि, कई राज्यों में इसे महज औपचारिकता बना दिया गया है। उत्तर भारत के स्कूलों में अक्सर हिंदी-अंग्रेजी के साथ संस्कृत का एक छोटा पाठ्यक्रम जोड़कर खानापूर्ति कर दी जाती है, जो इस नीति की मूल भावना के विपरीत है।

क्यों बरकरार हैं चुनौतियां?

नीति के सही क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा राज्य सरकारों की ढिलाई है। शिक्षा नीति को लागू करने का 95 प्रतिशत दायित्व राज्यों का है, जो निम्नलिखित कारणों से विफल हो रहा है:

क्या है थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला?

इस फॉर्मूले की शुरुआत 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कोठारी आयोग की सिफारिशों पर की गई थी। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समझ से जोड़ना था। इसके तहत छात्रों को तीन भाषाएं सिखाई जानी चाहिए: मातृभाषा/घर की भाषा और दो अन्य आधुनिक भारतीय भाषाएं या अंग्रेजी। NEP 2020 ने भी इस ढांचे को बरकरार रखा है, लेकिन इसमें पहले की तुलना में अधिक लचीलापन (Flexibility) दिया गया है।

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