राष्ट्र के नाम संबोधन या चुनावी भाषण? पीएम मोदी पर क्यों भड़का विपक्ष
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया राष्ट्र के नाम संबोधन नए राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद, पीएम मोदी ने कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और सपा जैसी विपक्षी पार्टियों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने इन दलों पर स्वार्थी राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा कि देश की महिलाएं उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी।

कीचड़ उछालने वाला भाषण

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस संबोधन की तीखी आलोचना की है। खड़गे ने सोशल मीडिया पर कहा कि एक हताश प्रधानमंत्री ने संवैधानिक पद की गरिमा गिराते हुए राष्ट्र के नाम संबोधन को आधिकारिक कीचड़ उछालने का जरिया बना दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पीएम ने महिलाओं की बात कम और कांग्रेस का नाम 59 बार लेकर अपनी असली प्राथमिकताओं को उजागर किया है।

चुनावी राज्यों पर निशाने

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीएम मोदी का यह आक्रामक रुख संयोग नहीं है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी महिला वोटर्स को साधने की कोशिश में है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पीएम ने जिस तरह टीएमसी और डीएमके का नाम लेकर उन्हें घेरा, वह सीधे तौर पर चुनाव प्रचार का ही हिस्सा है।

परिसीमन का विवाद

विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन (Delimitation) का ऐसा प्रस्ताव लाई थी जो दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम करता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम सितंबर 2023 में ही सर्वसम्मति से पास हो गया था, तो उसे लागू करने के बजाय अब संशोधन बिल क्यों लाया गया?

क्या बीजेपी को पहले से था अंदेशा?

वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का मानना है कि बीजेपी को पता था कि सदन में उनके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है और बिल गिर जाएगा। उनके अनुसार, यह पूरी कवायद एक सोची-समझी रणनीति थी ताकि बिल गिरने के बाद विपक्ष को महिला विरोधी साबित कर चुनावी लाभ उठाया जा सके।

गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप

पत्रकार हेमंत अत्री का कहना है कि वर्तमान में देश होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव और संभावित ऊर्जा संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे मुश्किल समय में, राष्ट्र के नाम संबोधन का उपयोग चुनावी राजनीति के लिए करना लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रतिकूल है। विपक्ष का तर्क है कि अगर सरकार की मंशा सच में आरक्षण देने की होती, तो वे मौजूदा सीटों पर ही इसे लागू कर देते, न कि इसे परिसीमन की जटिलताओं में फंसाते।

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