महिला आरक्षण बिल: विपक्ष के कारण गिरा कानून, तो फिर PM मोदी ने क्यों मांगी देश की महिलाओं से माफी?
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संसद के गलियारों से लेकर देश की चौपालों तक इस समय नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का गिरना चर्चा का केंद्र बना हुआ है। शुक्रवार को लोकसभा में जो हुआ, उसने भारतीय राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है। बिल के गिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संबोधन में विपक्ष पर तीखा हमला बोला और साथ ही करोड़ों महिलाओं से हाथ जोड़कर माफी भी मांगी।

संसद में क्या हुआ? महिला आरक्षण कानून में संशोधन वाला 131वां बिल शुक्रवार को मतदान के लिए रखा गया था। संविधान संशोधन के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य होता है। हालांकि एनडीए के पास साधारण बहुमत है, लेकिन इस विशेष विधेयक के लिए जरूरी जादुई आंकड़े तक वह नहीं पहुंच सका। बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। बहुमत के बावजूद तकनीकी रूप से यह बिल गिर गया।

पीएम मोदी ने क्यों मांगी माफी? पीएम मोदी का माफी मांगना उनकी एक गहरी राजनीतिक और भावनात्मक रणनीति का हिस्सा है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण माने जा रहे हैं:

  1. नैतिक जिम्मेदारी: पीएम ने खुद को एक ऐसे भाई के रूप में पेश किया जो अपनी बहनों को अधिकार दिलाना चाहता था, लेकिन विफल रहा। उन्होंने कहा, हमारे प्रयासों के बावजूद हम सफल नहीं हो पाए, मैं सभी माताओं-बहनों से क्षमाप्रार्थी हूं।
  2. इमोशनल कार्ड: माफी मांगकर पीएम ने महिलाओं के साथ सीधा भावनात्मक जुड़ाव बनाया है। उन्होंने जनता को यह संदेश दिया कि उनकी मंशा नेक थी, लेकिन विपक्षी पार्टियों ने इसे सफल नहीं होने दिया।
  3. विपक्ष को घेरने की रणनीति: माफी के जरिए पीएम ने कांग्रेस, सपा, टीएमसी और डीएमके को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश की है। उन्होंने बिल गिरने पर विपक्ष के जश्न को उनके खिलाफ एक राजनीतिक हथियार बना दिया है।

विपक्ष का पलटवार: संविधान पर हमले का आरोप विपक्ष के नेताओं ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे संविधान के मूल ढांचे के साथ खिलवाड़ बताया है। विपक्ष का तर्क है कि इस संशोधन के जरिए दक्षिण भारतीय और पूर्वोत्तर राज्यों की ताकत को कम करने की कोशिश की गई है। उनके मुताबिक, यह लड़ाई सिर्फ महिला आरक्षण की नहीं, बल्कि राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा की है।

बिल गिरने के सियासी मायने इस बिल का गिरना भारतीय राजनीति में एक बड़े ध्रुवीकरण का कारण बनेगा। भाजपा अब इस मुद्दे को आगामी चुनावों में महिला वोट बैंक को साधने के लिए इस्तेमाल करेगी, वहीं विपक्ष इसे संघवाद की रक्षा के रूप में पेश करेगा। तकनीकी रूप से, अब महिला आरक्षण और इसके प्रावधान जनगणना तथा भविष्य के परिसीमन पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं। यह घटनाक्रम आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर सकता है।

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