महिला आरक्षण बिल: ममता के अभेद्य किले में सेंध लगाने की तैयारी में बीजेपी
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में महिलाएं हमेशा से साइलेंट किंगमेकर रही हैं। संसद में महिला आरक्षण बिल के अटकने के बाद अब राज्य का राजनीतिक तापमान सातवें आसमान पर है। बीजेपी ने इस मुद्दे को आगामी बंगाल चुनावों से जोड़कर ममता बनर्जी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

दिलीप घोष का सीधा निशाना मेदिनीपुर से भाजपा के कद्दावर नेता दिलीप घोष ने इस बिल के लिए विपक्ष और महिला नेताओं की असहमति को जिम्मेदार ठहराया है। घोष का साफ तौर पर इशारा टीएमसी की ओर है। उनका तर्क है कि अगर टीएमसी वास्तव में महिला सशक्तिकरण की समर्थक है, तो उसे बिना शर्त इस ऐतिहासिक कदम का साथ देना चाहिए था।

ममता का महिला वोट बैंक दांव ममता बनर्जी बंगाल में खुद को बेटी और दीदी के रूप में स्थापित कर चुकी हैं। लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री जैसी योजनाओं ने उन्हें महिलाओं के बीच एक मजबूत आधार दिया है। बीजेपी अब इसी नैरेटिव को चुनौती दे रही है। पार्टी का मानना है कि बिल का विरोध करके ममता ने महिलाओं के अधिकारों को बाधित किया है, जिसे चुनावी मुद्दा बनाकर उनके वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती है।

टीएमसी का पलटवार: कोटे के भीतर कोटा दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाते हुए कोटे के भीतर कोटा की मांग दोहराई है। ममता बनर्जी का तर्क है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण न होना इस बिल की सबसे बड़ी कमी है। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी इस बिल का इस्तेमाल केवल चुनावी लाभ के लिए कर रही है, जबकि टीएमसी ने संसद में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देकर पहले ही अपनी मंशा साफ कर दी है।

चुनाव पर कितना असर? राज्य की राजनीति में महिला वोटरों की भागीदारी निर्णायक होती है। पिछले चुनावों में टीएमसी की जीत के पीछे महिलाओं का भारी समर्थन था। विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीजेपी इस नैरेटिव को शहरी और मध्यम वर्गीय महिलाओं के बीच स्थापित करने में सफल रहती है, तो ममता बनर्जी को नुकसान हो सकता है। हालांकि, ग्रामीण बंगाल में ममता की योजनाओं का असर इतना गहरा है कि राष्ट्रीय स्तर के बिल का प्रभाव शायद ही वहां उनकी पकड़ ढीली कर सके।

अस्मिता बनाम राजनीति दिलीप घोष और टीएमसी के बीच छिड़ी यह जंग फिलहाल राज्य की चाय की दुकानों और कस्बों की चर्चा का मुख्य विषय बन चुकी है। एक तरफ बीजेपी इसे प्रधानमंत्री का विजन बता रही है, तो दूसरी तरफ टीएमसी इसे संघीय ढांचा और सामाजिक न्याय की लड़ाई बता रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनावों में राज्य की करोड़ों महिलाएं इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती हैं।

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