कर्पूरी ठाकुर की विरासत और एमके स्टालिन का द्रविड़ मॉडल : 2026 के लिए क्या है मास्टरस्ट्रोक?
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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में सोशल जस्टिस यानी सामाजिक न्याय का एक नया विमर्श उभर रहा है। मेट्टुपलायम में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की मुलाकात ने इसे और हवा दे दी है। स्टालिन ने तेजस्वी के साथ एक साझा तस्वीर पोस्ट कर इसे पेरियार और कर्पूरी ठाकुर की विरासत से जोड़ा है।

दक्षिण और उत्तर का अनूठा संगम यह पहली बार है जब दक्षिण भारतीय द्रविड़ राजनीति और उत्तर भारत की मंडल राजनीति को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई है। पेरियार का द्रविड़ मॉडल और कर्पूरी ठाकुर का आरक्षण फॉर्मूला अब 2026 की चुनावी रणनीति का मुख्य आधार बनते दिख रहे हैं। स्टालिन का यह दांव उन्हें केवल तमिलनाडु के नेता से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय सोशल जस्टिस गठबंधन के सूत्रधार के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।

क्या है कर्पूरी ठाकुर का जादुई फॉर्मूला? बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जननायक कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में बिहार में ओबीसी को 26% आरक्षण देकर राजनीति की दिशा बदल दी थी। उन्होंने आरक्षण के भीतर आरक्षण लागू किया, जिसने अति पिछड़ों (EBC) को मुख्यधारा में खड़ा किया। स्टालिन इसी फॉर्मूले को तमिलनाडु में भुनाना चाहते हैं, ताकि प्रवासी बिहारियों और राज्य के पिछड़े वर्ग के बीच एक भावनात्मक सेतु बनाया जा सके।

जाति का गणित और संघर्ष की समानता कर्पूरी ठाकुर नाई समुदाय से थे, जो अत्यंत पिछड़ा वर्ग में आता है, जबकि स्टालिन और करुणानिधि इसै वेल्लालर समुदाय से हैं। दोनों ही नेता ऐसी पिछड़ी जातियों से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें ऐतिहासिक रूप से सत्ता से दूर रखा गया था। तेजस्वी यादव अपनी सभाओं में लगातार कह रहे हैं कि तमिलनाडु का शासन सामाजिक न्याय पर टिका है, जो सीधे तौर पर भाजपा के हिंदुत्व कार्ड के खिलाफ जाति जनगणना और आरक्षण को ढाल बना रहा है।

2029 की तैयारी तो नहीं? स्टालिन और तेजस्वी की यह एकजुटता महज 2026 के तमिलनाडु चुनाव तक सीमित नहीं दिख रही है। यह घृणा बनाम न्याय की लड़ाई को एक राष्ट्रीय नैरेटिव देने का प्रयास है। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह उत्तर-दक्षिण की साझा ताकत बनकर 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए केंद्र की सत्ता को घेरने की एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। स्टालिन का यह कदम सोशल जस्टिस के मुद्दे को केंद्र में रखकर दिल्ली की राजनीति का रुख मोड़ने की एक सोची-समझी रणनीति मालूम होती है।

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