CJP के जेल भरो आंदोलन में विशाल ददलानी की एंट्री, कहा- अभी तो पार्टी शुरू हुई है
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मुंबई के शिवाजी पार्क में शुक्रवार (2 अक्टूबर) को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का जेल भरो आंदोलन चर्चा का केंद्र बन गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित इस प्रदर्शन में मशहूर संगीतकार और गायक विशाल ददलानी की मौजूदगी ने माहौल गरमा दिया।

विशाल ददलानी ने भरा जोश मंच से प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए विशाल ददलानी ने कहा कि वे इस आंदोलन का हिस्सा बनकर बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, मुझे दिल्ली में अभिजीत दीपके के साथ जुड़ने का मौका नहीं मिला था, लेकिन यहां आकर बहुत अच्छा लग रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया कि यह आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा और इसे जारी रखा जाएगा। इस दौरान उन्होंने समर्थकों के साथ गो ज्ञानू गो के नारे भी लगाए।

क्या है CJP की मुख्य मांग? CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा है। संगठन का आरोप है कि मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियां की गई हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ डुप्लिकेट और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है।

पुलिस की सख्ती और सुरक्षा के कड़े इंतजाम शिवाजी पार्क में इस प्रदर्शन को लेकर प्रशासन और आयोजकों में ठन गई थी। मुंबई पुलिस ने यातायात, ध्वनि प्रदूषण और अस्पताल के मरीजों को होने वाली असुविधा का हवाला देते हुए प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद CJP अपने रुख पर अड़ी रही। पुलिस ने सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग, एंटी-रायट टीम और क्विक रिस्पॉन्स टीम के साथ शिवाजी पार्क को छावनी में तब्दील कर दिया था।

सिने जगत का मिला साथ 2 अक्टूबर की तारीख को गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित इस जेल भरो आंदोलन में विशाल ददलानी के अलावा अभिनेत्री शबाना आजमी भी शामिल हुईं। यह पहली बार नहीं है जब विशाल ददलानी ने CJP को समर्थन दिया हो; इससे पहले भी वे सोशल मीडिया के जरिए इस मुहिम की वकालत कर चुके हैं।

आगे क्या होगा? अभिजीत दीपके ने साफ कर दिया है कि यह आंदोलन केवल मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा। संगठन की योजना इसे दिल्ली के जंतर-मंतर ले जाने और देश के अन्य हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन करने की है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव आयोग और प्रशासन इस बढ़ते दबाव पर आगे क्या कदम उठाते हैं।

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