पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत के साथ सुपर हाईवे बनाएंगे पुतिन, बचत और व्यापार का नया अध्याय
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पश्चिमी देशों के दबाव के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बार फिर भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम देने की बात कही है। पुतिन ने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) को रूस और भारत के बीच व्यापार की भविष्य की लाइफलाइन बताया है।

पुतिन बोले- भारतीय दोस्तों से हो रही बातचीत मॉस्को में आयोजित वल्दाई फोरम में पुतिन ने स्पष्ट किया कि रूस अपने लॉजिस्टिक नेटवर्क को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि चीन और दक्षिण कोरिया के साथ ट्रायल सफल होने के बाद अब रूस अपने भारतीय दोस्तों के साथ मिलकर इस कॉरिडोर के पूर्ण संचालन पर चर्चा कर रहा है। पुतिन ने जोर दिया कि वे इस कॉरिडोर का उपयोग संयुक्त रूप से करने के पक्ष में हैं।

ईरान और अजरबैजान पर टिकी नजरें इस प्रोजेक्ट की सफलता के लिए पुतिन ने कुछ तकनीकी चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि रूस कॉरिडोर के लिए वित्तीय संसाधन (क्रेडिट) देने को तैयार है, लेकिन इसके लिए ईरान को अपना बुनियादी ढांचा पूरा करना होगा। उन्होंने अजरबैजान के राष्ट्रपति अलीयेव के साथ सकारात्मक बातचीत की पुष्टि करते हुए कहा कि वहां से कोई समस्या नहीं है।

क्या है INSTC और भारत को क्यों है जरूरत? इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर 7,200 किलोमीटर लंबा एक मल्टी-मॉडल नेटवर्क है। यह मुंबई से शुरू होकर ईरान के बंदरगाहों और कैस्पियन सागर के रास्ते रूस के सेंट पीटर्सबर्ग तक जाता है। यह रास्ता पाकिस्तान से होकर गुजरने की मजबूरी को खत्म करता है, जिससे भारत सीधे मध्य एशिया और यूरोप से जुड़ जाता है।

समय और पैसे की बड़ी बचत इस गलियारे की सबसे बड़ी खूबी इसकी रफ्तार है। पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग से रूस पहुँचने में 40 से 60 दिन का समय लगता है, लेकिन INSTC के जरिए यह दूरी महज 16 से 21 दिन में तय की जा सकती है। इससे ढुलाई का खर्च 30% तक कम हो जाता है।

सुरक्षा और व्यापार का नया विकल्प लाल सागर में बढ़ते तनाव और स्वेज नहर में होने वाली संभावित देरी के बीच यह कॉरिडोर भारत के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय विकल्प बनकर उभरा है। यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व की अस्थिरता के बावजूद, भारत और रूस दोनों इस प्रोजेक्ट को अपनी आर्थिक प्राथमिकता मान रहे हैं। यह गलियारा न केवल भारतीय कृषि और औद्योगिक निर्यात को बढ़ावा देगा, बल्कि यूरेशियाई बाजारों में भारत की पैठ को भी मजबूत करेगा।

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