समुद्र के भीतर छिपे तेल के खजाने की तलाश में भारत, जोखिम उठाकर सरकार ने उठाया बड़ा कदम
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दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत आज भी 88% आयात पर निर्भर है, जिस पर सालाना 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होते हैं। इसी निर्भरता को कम करने के लिए अब सरकार ने समंदर के गहरे पानी में खोज अभियान चलाने का साहसी फैसला लिया है।

क्या है 84,084 करोड़ की समुद्र मंथन योजना? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने समुद्र मंथन योजना को मंजूरी दी है। यह दुनिया का शायद पहला ऐसा सरकारी प्रोजेक्ट है, जिसमें बजट से पैसा खर्च करके गहरे समंदर में तेल और गैस के भंडारों की खोज की जाएगी। इसका प्राथमिक लक्ष्य उन अनदेखे भंडारों का पता लगाना है, जो अब तक खोजे नहीं जा सके हैं।

सरकारी खजाने से क्यों लिया जा रहा है रिस्क? अक्सर निजी कंपनियां गहरे समंदर में ड्रिलिंग का जोखिम उठाने से बचती हैं, क्योंकि असफलता मिलने पर भारी निवेश डूब जाता है। अब सरकार इस रिस्क को खुद उठा रही है। योजना के तहत, खोज के लिए कुआं खोदने की लागत का आधा हिस्सा (650 करोड़ रुपये प्रति कुआं) सीधे सरकारी बजट से दिया जाएगा। अगले 5 वर्षों में सरकार 60 ऐसे कुओं की खुदाई के लिए आर्थिक मदद देगी।

आयात पर निर्भरता और घटता घरेलू उत्पादन भारत में कच्चे तेल की खपत दुनिया में तीसरी सबसे अधिक है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में आयात पर हमारी निर्भरता 85.5% से बढ़कर 88.7% तक पहुंच गई है। वहीं, पुराने पड़ चुके कुओं में पानी और रेत भरने के कारण घरेलू उत्पादन घटकर 28 मिलियन मीट्रिक टन पर आ गया है। इस गिरावट को रोकने के लिए नई खोजें अनिवार्य हो गई हैं।

कैसे खर्च होगी भारी-भरकम राशि? 2031 तक चलने वाली इस योजना में 84,084 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। इसमें से 43,200 करोड़ रुपये सिर्फ गहरे और अति-गहरे समंदर की ड्रिलिंग पर खर्च होंगे। साथ ही, 10,000 करोड़ रुपये पाइपलाइन और प्रोसेसिंग जैसे कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रखे गए हैं, जबकि 28,534 करोड़ रुपये ऑफशोर डेटा जुटाने में लगाए जाएंगे ताकि वैज्ञानिक आधार पर सही जगह की पहचान हो सके।

खोज का दायरा बढ़ा, नो-गो इलाकों को हटाया सरकार ने एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) में मौजूद 99% से अधिक नो-गो (प्रतिबंधित) क्षेत्रों को खोल दिया है। अब 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का समुद्री इलाका खोज के लिए उपलब्ध है। हालांकि, यह मिशन चुनौतीपूर्ण है क्योंकि समंदर में तेल मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। लेकिन यदि यह दांव सफल रहता है, तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा निर्भरता कम कर सकेगा, बल्कि विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा भी बचा पाएगा।

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