1990 का अग्निपथ : जब मंडल आंदोलन की आग में झुलस गया था देश, प्रियंका चतुर्वेदी ने साझा कीं पुरानी यादें
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नई दिल्ली: नीट-यूजी परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर जारी छात्र विरोध के बीच, शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने 1990 के मंडल आंदोलन के काले पन्नों को फिर से खोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए उस दौर को भारतीय इतिहास का सबसे दर्दनाक मोड़ बताया है।

वी.पी. सिंह सरकार और आरक्षण का बिगुल

7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान किया था। इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। इस फैसले से देश दो धड़ों में बंट गया; एक तरफ इसे सामाजिक न्याय की बड़ी जीत माना गया, तो दूसरी तरफ आलोचकों ने इसे योग्यता की हत्या करार दिया।

जब कैंपस बन गए रणभूमि

आरक्षण लागू होते ही उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में विरोध की ज्वाला भड़क उठी। प्रियंका चतुर्वेदी ने बताया कि उनके पति, जो उस समय आईआईटी दिल्ली के छात्र थे, ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया था। उन्होंने बताया, विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण मेरे पति को भी हिरासत में लिया गया था। यह आंदोलन केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षण संस्थानों का आधार बन गया।

60 छात्रों की मौत और आत्मदाह की लहर

इस आंदोलन की सबसे भयावह तस्वीर सितंबर 1990 में सामने आई। दिल्ली के छात्र राजीव गोस्वामी ने लाइव टेलीविजन पर खुद को आग के हवाले कर दिया। यह एक ऐसी चेन रिएक्शन थी, जिसने पूरे देश को हिला दिया। प्रियंका ने बताया कि इस दौरान 200 से अधिक युवाओं ने आत्मदाह का प्रयास किया, जिसमें 60 छात्रों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह सरकार और युवाओं के बीच का एक बेहद खौफनाक टकराव था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रीमी लेयर

यह कानूनी लड़ाई 1992 तक सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। कोर्ट ने 27% कोटे को संवैधानिक रूप से सही ठहराया, लेकिन इसे संतुलित करते हुए क्रीमी लेयर का प्रावधान जोड़ा, ताकि आरक्षण का लाभ केवल वास्तव में जरूरतमंदों तक ही पहुंचे।

कैंपस ही लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी

प्रियंका चतुर्वेदी ने मौजूदा छात्र आंदोलनों (जैसे नीट पेपर लीक) और मंडल आंदोलन के बीच समानताएं दिखाईं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कैंपस दशकों से व्यवस्था के खिलाफ युवाओं की आवाज उठाने का मुख्य केंद्र रहे हैं। उन्होंने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि आज की पीढ़ी जिस तरह संस्थागत पारदर्शिता के लिए लड़ रही है, वह यह याद दिलाता है कि कैंपस ही भारतीय राज्य के अंतिम प्रहरी हैं।

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