NEET और पेपर लीक: क्या 2027 के यूपी रण में राहुल-अखिलेश का ब्रह्मास्त्र है युवाओं का आक्रोश?
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लखनऊ। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नीट (NEET) परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। हाल ही में तमिलनाडु के उन तीन पीड़ित परिवारों से उनकी मुलाकात, जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया, इस बात का संकेत है कि विपक्ष इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में जाने नहीं देगा।

राहुल गांधी क्यों नहीं छोड़ रहे NEET का मुद्दा? संसद में कड़े कानून पारित होने के बावजूद राहुल गांधी का आक्रामक रुख यह दर्शाता है कि वे इसे केवल एक परीक्षा का मामला नहीं मानते। उनका लक्ष्य देश के करोड़ों युवा और मध्यम वर्गीय मतदाता हैं। ईमानदार छात्रों को बेईमान सिस्टम की कीमत क्यों चुकानी पड़े? — यह सवाल पूछकर वे सीधे सरकार की प्रशासनिक विफलता और इच्छाशक्ति पर निशाना साध रहे हैं।

2027 के यूपी चुनाव की बिसात उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा चुनावी राज्य है, जहाँ सरकारी भर्तियों में धांधली का मुद्दा हमेशा से एक बड़ा राजनीतिक कारक रहा है। चाहे UPPSC हो, RO/ARO या फिर सिपाही भर्ती, पेपर लीक की घटनाओं ने राज्य के युवाओं में गहरा आक्रोश पैदा किया है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी इसी आक्रोश को 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी मुख्य ताकत बनाने की तैयारी में है।

अखिलेश-राहुल का युवा केंद्रित गठबंधन 2024 लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद, सपा और कांग्रेस 2027 के लिए भी अपनी रणनीतिक एकजुटता बरकरार रखे हुए हैं। अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूला और राहुल गांधी का युवा और न्याय का एजेंडा एक ऐसा मिश्रण तैयार कर रहा है, जो बीजेपी के विकास और धार्मिक ध्रुवीकरण के दावों के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सकता है।

युवाओं के गुस्से का राजनीतिकरण यूपी की कुल आबादी में 18 से 35 वर्ष के युवाओं की संख्या निर्णायक है। पेपर लीक के मुद्दे को जीवित रखकर विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सत्ताधारी दल युवाओं के भविष्य के प्रति संवेदनशील नहीं है। पीड़ित परिवारों से राहुल गांधी की व्यक्तिगत मुलाकात इसी संवेदना की राजनीति का हिस्सा है, जो सीधे तौर पर युवाओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम करती है।

आगे की चुनौती राहुल और अखिलेश की इस रणनीति ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब सवाल यह है कि क्या सत्ताधारी दल केवल कानूनों के दम पर इस मुद्दे को दबा पाएगा, या फिर विपक्ष का यह युवा-केंद्रित नैरेटिव 2027 के चुनावी परिणामों को बदलने में सफल होगा? यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि पेपर लीक का मुद्दा यूपी के आगामी चुनावी समर में सबसे धारदार हथियार बनने जा रहा है।

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