कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का मान: कौन हैं शर्मिला धनखड़, जिन्होंने गरीबी और हिंसा को हराकर जीता गोल्ड?
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ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का परचम लहराने वाली पैरा-एथलीट शर्मिला धनखड़ ने इतिहास रच दिया है। वुमेंस शॉट पुट F57 इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने न केवल देश का गौरव बढ़ाया है, बल्कि पैरा-एथलेटिक्स में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर 20 साल का सूखा खत्म किया है। लेकिन इस स्वर्ण पदकीय सफलता के पीछे की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक है।

बचपन में पोलियो और संघर्ष की शुरुआत हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव में 1986 में जन्मी शर्मिला को महज दो साल की उम्र में पोलियो हो गया था। एक पैर में गंभीर समस्या के बावजूद गरीबी के कारण उनका सही इलाज नहीं हो सका। किसान पिता की बेटी शर्मिला का जीवन शुरुआत से ही चुनौतियों से भरा रहा।

घरेलू हिंसा और बेदखली का काला दौर कम उम्र में शादी के बाद शर्मिला की मुश्किलें और बढ़ गईं। उन्हें दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित किया गया और घरेलू हिंसा का शिकार बनाया गया। 26 साल की उम्र में पति ने उन्हें और उनकी दो बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया। हारकर उन्हें वापस अपने पिता के घर लौटना पड़ा, जहां वे भारी मानसिक तनाव और आत्महत्या के विचारों से जूझ रही थीं। उन्होंने परिवार चलाने के लिए आया तक का काम किया।

दूसरी शादी और खेलों में नई उम्मीद 28 साल की उम्र में हुई दूसरी शादी ने शर्मिला की जिंदगी की दिशा बदल दी। उनके पति अजीत सिंह ने न केवल उनका साथ दिया, बल्कि उन्हें पैरा-एथलेटिक्स में अपनी प्रतिभा तलाशने के लिए प्रेरित किया। 34 साल की उम्र में उन्होंने कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में शॉट पुट की ट्रेनिंग शुरू की।

घर तक बेचना पड़ा, पर नहीं मानी हार प्रशिक्षण का खर्च उठाना शर्मिला के लिए बड़ी चुनौती थी। 2023 में पति की खराब तबीयत और ट्रेनिंग के खर्च को पूरा करने के लिए उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा। आर्थिक बदहाली के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और नेशनल चैंपियनशिप में नया कीर्तिमान स्थापित किया। 2022 बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में मामूली अंतर से मेडल चूकने के बाद, उन्होंने खुद को फिर से तैयार किया और दुबई इंटरनेशनल चैंपियनशिप में सफलता अर्जित की।

सपनों की स्वर्णिम उड़ान ग्लासगो में गोल्ड मेडल जीतने के बाद शर्मिला भावुक नजर आईं। उन्होंने कहा, यह मेरा और मेरी मां का सपना था, जिसे मैंने आज पूरा किया है। अपनी बेटियों को अकेले पालने से लेकर देश के लिए तिरंगा लहराने तक का शर्मिला का सफर यह साबित करता है कि इच्छाशक्ति के सामने कोई भी बाधा टिक नहीं सकती।

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