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सोनम वांगचुक का 26 दिनों का लंबा अनशन आखिरकार गुरुवार आधी रात को समाप्त हो गया, लेकिन इसके अंत का तरीका और तस्वीरें अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई हैं। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा की मौजूदगी में अनशन तोड़ने की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, विशेष रूप से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और वांगचुक की रणनीति को लेकर।
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने सोशल मीडिया पर दो तस्वीरों की तुलना करते हुए लिखा है, तस्वीरें खुद बोलती हैं। एक तरफ जे.पी. नड्डा द्वारा वांगचुक का अनशन तुड़वाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों का अनशन शबाना आज़मी और मनोज झा जैसे विपक्षी नेताओं की मौजूदगी में टूटा। इस अंतर ने सीजेपी समर्थकों और वांगचुक के बीच वैचारिक दूरी को उजागर कर दिया है।
द वायर के संस्थापक एमके वेणु और अन्य टिप्पणीकारों ने इस पर चिंता जताई है। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने राहुल गांधी के धरने को असार करार देते हुए जंतर-मंतर पर होने पर जोर दिया था, जबकि सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने राहुल के धरने का स्वागत किया था।
इतना ही नहीं, सीजेपी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़ी है, जबकि वांगचुक बातचीत के दौरान इसे संसद की प्रक्रिया पर छोड़ने की बात कह चुके हैं। सीजेपी नेता सरकारी कार्यालयों या मंत्रियों के घरों पर जाने से परहेज कर रहे हैं, जबकि वांगचुक का बीजेपी मंत्रियों के साथ समन्वय कई लोगों को खटक रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने अनशन टूटने का स्वागत तो किया, लेकिन सरकार के आश्वासनों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस न बनाना कोई बड़ी रियायत नहीं है, क्योंकि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर तो वैसे भी मुकदमा नहीं होना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि शांतिपूर्ण होने का पैमाना सरकार तय करेगी या कानून? सीजेपी के युवा नेताओं ने भी स्पष्ट किया है कि अनशन खत्म होने का मतलब आंदोलन का अंत नहीं है।
राजनीतिक विज्ञानी सुहास पलशिकर ने इस आंदोलन की तुलना 1974 के जेपी आंदोलन और 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की है। उनके अनुसार, यह आंदोलन अभी काफी असंगठित और स्वतःस्फूर्त है। जहां जेपी आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोला, वहीं कॉकरोच आंदोलन की दिशा अभी अनिश्चित है।
सोनम वांगचुक की छवि एक सक्रिय नागरिक की है, जो भविष्य की चिंता करने वाले सरकार के लिए एक चुनौती माने जाते हैं। लेकिन जिस तरह से उन्होंने सरकार के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अनशन तोड़ा, उससे यह आंदोलन अपनी धार खोएगा या नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, वांगचुक की इस यात्रा को लोग एक असाधारण कहानी के रूप में देख रहे हैं, जिसके कई मोड़ अभी बाकी हैं।
कई मौकों पर तस्वीरें स्वयं ही बोलती हैं, अपना भेद खोलती हैं! pic.twitter.com/A5xAa91qK1
— urmilesh (@UrmileshJ) July 24, 2026
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