मध्यप्रदेश में UCC का आगाज: क्या सभी के लिए समान कानून में आदिवासियों को छूट देना उचित है?
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मध्यप्रदेश में जल्द ही समान नागरिक संहिता (UCC) लागू हो सकती है। राज्य की भाजपा सरकार ने विधानसभा में मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता 2026 बिल पेश कर दिया है। यदि यह पारित होता है, तो मध्य प्रदेश उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद इसे लागू करने वाला चौथा राज्य बन जाएगा।

मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है कि इस कानून का मकसद राम, रहीम, रविंदर और रॉबिन सभी के लिए समान अधिकार और न्याय सुनिश्चित करना है।

बिल के मुख्य प्रावधान: क्या बदलेगा?

इस प्रस्तावित कानून के तहत विवाह और तलाक से जुड़े नियमों को पूरी तरह बदल दिया जाएगा:

आदिवासियों को छूट क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कानून समान है, तो अनुसूचित जनजातियों (ST) को इससे बाहर क्यों रखा गया है? मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 (25) के तहत आने वाले आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा।

इसके पीछे कानूनी और संवैधानिक रूप से चार बड़े कारण हैं:

  1. संवैधानिक सुरक्षा: संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता देती है। इन्हें अपने सामाजिक रीति-रिवाजों को संचालित करने के लिए ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (ADC) बनाने का अधिकार है।
  2. मातृसत्तात्मक परंपराएं: कई जनजातियों में उत्तराधिकार और संपत्ति के नियम मुख्यधारा के कानूनों से पूरी तरह अलग हैं। उदाहरण के लिए, मेघालय की गारो और खासी जनजातियों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था है। UCC लागू होने से उनकी सदियों पुरानी प्रथाएं प्रभावित हो सकती हैं।
  3. अनूठी सांस्कृतिक पहचान: आदिवासी समाज अपनी भाषा, जल-जंगल-जमीन और जीवनशैली को अपनी पहचान मानते हैं। उन्हें डर है कि समान कानून के नाम पर उनकी विशिष्टता विलुप्त हो जाएगी।
  4. लॉ कमीशन की राय: 21वें लॉ कमीशन ने भी माना था कि एक देश होने के लिए सब कुछ एक जैसा (एकरूप) होना अनिवार्य नहीं है। असली चुनौती विविधताओं को मानवाधिकारों के साथ जोड़ना है।

निष्कर्ष: समानता बनाम विविधता

समान नागरिक संहिता का लक्ष्य अनुच्छेद 44 के तहत एक समान न्याय प्रणाली तैयार करना है, जो दशकों से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे शाहबानो केस) में भी दोहराया गया है।

हालांकि, सरकार का मानना है कि आदिवासियों के मामले में समानता थोपने के बजाय उनकी सांस्कृतिक सुरक्षा को प्राथमिकता देना ही संविधान की वास्तविक भावना है। यही कारण है कि देश के किसी भी हिस्से में UCC लाते समय आदिवासियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया जा रहा है।

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