क्या बरसेंगे बादल या बस छाकर रह जाएंगे? इसरो की सैटेलाइट तस्वीरों ने खोला मानसून का रहस्य
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इसरो (ISRO) की हालिया सैटेलाइट तस्वीरें भारत के एक बड़े हिस्से के मिजाज को बयां कर रही हैं। देश के करीब दो-तिहाई हिस्से पर बादलों का डेरा है। जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत और उत्तर प्रदेश से लेकर दक्षिण भारत तक आसमान बादलों से ढका नजर आ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये बादल झमाझम बारिश लाएंगे या केवल आसमान में नमी बनकर तैरते रहेंगे?

सैटेलाइट कैसे पढ़ते हैं बादलों की भाषा?

इसरो का INSAT-3DR उपग्रह पृथ्वी से 36,000 किलोमीटर दूर जियोसिंक्रोनस कक्षा में तैनात है। यह हर 30 मिनट में भारत की नई तस्वीरें भेजता है। मौसम वैज्ञानिक इन बादलों को समझने के लिए क्लाउड टॉप ब्राइटनेस टेंप्रेचर का इस्तेमाल करते हैं।

सीधी सी बात है—बादल जितना अधिक ठंडा होगा, उसके बरसने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। सैटेलाइट डेटा के अनुसार, जिन बादलों का तापमान -40°C से कम है, वहां गरज-चमक की आशंका है, और जो -70°C से नीचे हैं, वे शक्तिशाली तूफानी बारिश का संकेत देते हैं।

हर बादल में बारिश क्यों नहीं?

यह एक आम भ्रम है कि आसमान में बादल हैं तो हर जगह बारिश होगी। असल में, कई बादल केवल नमी लेकर चलते हैं या उनसे हल्की फुहारें ही पड़ती हैं। भारी बारिश के लिए ऊंचे और घने गरज वाले बादलों का होना जरूरी है। यही कारण है कि एक जिले में मूसलाधार बारिश होती है, जबकि पड़ोसी जिले में धूप खिली रहती है।

कहां बरसेंगे मेघ और क्या है चेतावनी?

मौसम विभाग (IMD) की मानें तो मानसून की सक्रियता फिर से बढ़ रही है। अगले 4 से 5 दिनों में उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में भारी बारिश के आसार हैं।

बारिश का घाटा और खेती पर असर

फिलहाल देश में मानसून के दौरान औसत बारिश सामान्य से करीब 24% कम दर्ज की गई है। जुलाई के दूसरे हफ्ते में मानसून की रफ्तार धीमी पड़ने से यह गैप बढ़ा था। अब मानसून के दोबारा सक्रिय होने से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि खरीफ फसलों की बुवाई के लिए यह बारिश जीवनदायिनी है।

हालांकि, देश के कुछ राज्यों में बाढ़ जैसे हालात हैं, तो कुछ में सूखे का डर बना हुआ है। मानसून की यह असमान स्थिति ही इस बार की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। मौसम विभाग ने लोगों को सलाह दी है कि वे खराब मौसम के दौरान सतर्क रहें और आधिकारिक चेतावनियों पर नजर बनाए रखें।

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