मैथिली साहित्य के दो महानायकों को सहरसा में मिला सम्मान, डॉ. मनोरंजन झा और डॉ. जयानंद झा पर हुआ मंथन
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सहरसा। मैथिली साहित्य की समृद्ध परंपरा के दो स्तंभों, डॉ. मनोरंजन झा और डॉ. जयानंद झा के योगदान को याद करने के लिए सहरसा के स्नातकोत्तर केंद्र में एक भव्य परिसंवाद का आयोजन किया गया। साहित्य अकादेमी, संस्कृति मंत्रालय और परमहंस लक्ष्मीनाथ गोसाई चेयर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों और साहित्यकारों का जमावड़ा लगा।

जनपक्षधर साहित्य के पुरोधा थे डॉ. मनोरंजन झा परिसंवाद के पहले सत्र में डॉ. मनोरंजन झा के कृतित्व पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने उन्हें एक प्रखर जनपक्षधर साहित्यकार बताया। सुधासंध्या और अन्य वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपनी कविताओं, नाटकों और उपन्यासों के जरिए हमेशा समाज के वंचित वर्ग की आवाज उठाई। भ्रष्टाचार और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उनका लेखन समाज को आईना दिखाने का काम करता था।

बहुभाषी विद्वान थे डॉ. जयानंद झा दूसरे सत्र में डॉ. जयानंद झा की बहुमुखी प्रतिभा को रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि वे न केवल मैथिली साहित्य के मूर्धन्य विद्वान थे, बल्कि हिंदी, अंग्रेजी, बंगला और संस्कृत भाषाओं के भी गहरे जानकार थे। प्रकाश झा और आलोक झा जैसे वक्ताओं ने उनके पत्रकारिता में दिए गए योगदान को मील का पत्थर बताया, जिसने मैथिली समाज और संस्कृति को एक नई वैचारिक दिशा दी।

साहित्यिक विरासत का हुआ लोकार्पण कार्यक्रम की एक प्रमुख कड़ी पुस्तकों का लोकार्पण रहा। इस दौरान मैथिली साहित्य की दो महत्वपूर्ण कृतियों—‘ईंटउघनी’ और ‘हेरायल दिवस’—को सार्वजनिक किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी कृतियों का प्रकाशन आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों और भाषाई गौरव से जोड़ने के लिए अनिवार्य है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बीज भाषण देते हुए डॉ. कुलानंद झा ने साहित्य के संरक्षण पर जोर दिया। वक्ताओं का मानना था कि ऐसे परिसंवाद मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय स्तर पर क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने की एक बड़ी मुहिम हैं। कार्यक्रम का संचालन किसलय कृष्ण ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अरुण कुमार सिंह ने दिया।

साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति इस आयोजन में सहरसा के बौद्धिक वर्ग ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम में डॉ. रमाकांत रमण, डॉ. लाला प्रवीण कुमार सिन्हा, डॉ. सिद्धेश्वर कश्यप और डॉ. रंजीत सिंह सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, छात्र और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। यह आयोजन मैथिली भाषा की जीवंतता और उसके प्रति सहरसा के लोगों के गहरे लगाव को प्रदर्शित करता है।

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