नीट पेपर लीक और सॉल्वर गैंग: क्या अब वक्त आ गया है इन्हें मौत की सजा देने का?
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युवाओं के सपनों का कत्ल युवाओं की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ करना एक सामाजिक पाप है। नीट की परीक्षा में सेंधमारी की साजिश रचने वाले सॉल्वर गैंग और पेपर लीक माफिया ने साबित कर दिया है कि वे केवल पैसों के लोभी नहीं, बल्कि देश के भविष्य के दुश्मन हैं। कड़ी सुरक्षा के बावजूद, जहां भारतीय वायु सेना के जरिए प्रश्न पत्र केंद्रों तक पहुंचाए गए, वहां भी इन समाजद्रोहियों ने सेंध लगाने की कोशिश की।

बिहार से पकड़ा गया सॉल्वर गैंग का नेटवर्क बिहार के लखीसराय में 30 संदिग्धों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है, जिनमें 9 ऐसे सॉल्वर शामिल हैं जो असली छात्रों की जगह परीक्षा दे रहे थे। हैरान करने वाली बात यह है कि आरोपियों में डॉक्टर, मेडिकल छात्र और बायोमैट्रिक प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारी भी शामिल थे। यानी जिन्हें सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी, वही सेंधमारी में लिप्त थे। इनमें से कई आरोपी पुराने आदतन अपराधी हैं, जो पहले भी सीबीआई की रडार पर रह चुके हैं।

10 छात्रों ने दी जान, कौन है जिम्मेदार? पेपर लीक सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों की हत्या है। नीट परीक्षा रद्द होने और री-एग्जाम के तनाव के चलते हाल ही में 10 होनहार छात्रों ने आत्महत्या कर ली। 18 साल की आकांक्षा चतुर्वेदी जैसे छात्रों ने सुसाइड नोट में अपनी हार स्वीकार कर ली, क्योंकि उनमें दोबारा परीक्षा देने का साहस नहीं बचा था। क्या इस मौत के लिए इन गैंग्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?

आर्थिक और मानसिक शोषण का जाल एक री-एग्जाम का असर सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं होता। कोचिंग, मानसिक तनाव और आर्थिक बोझ से हर छात्र और उसके परिवार का बजट बिगड़ जाता है। एक री-एग्जाम की तैयारी में छात्र को अतिरिक्त 35 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। साल भर की मेहनत पर पानी फिरने के बाद मनोचिकित्सकों के पास जाने वाले बच्चों की तादाद बढ़ना यह बताता है कि हमारा सिस्टम इन छात्रों को सुरक्षा देने में कहीं न कहीं विफल रहा है।

कानून सख्त, फिर सजा क्यों नहीं? देश में पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट के तहत 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले 23 वर्षों में 50 से अधिक पेपर लीक मामलों में से केवल 2 में ही सजा हो पाई है। कानून की धीमी रफ्तार अपराधियों के हौसले बुलंद कर रही है। अब मांग उठ रही है कि ऐसे दोषियों को मृत्युदंड दिया जाए।

परीक्षा के नाम पर राजनीतिक खींचतान नीट परीक्षा के दौरान बेंगलुरू में ट्रैफिक जाम और छात्रों के परीक्षा से वंचित रहने को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन असल मुद्दा यह है कि जो छात्र केंद्र तक पहुँचने के बावजूद परीक्षा नहीं दे पाए, उनका एक कीमती साल बर्बाद हो गया। क्या राजनीति से ऊपर उठकर इन छात्रों के भविष्य के बारे में सोचा जाएगा?

सवाल आज भी वही है: क्या सॉल्वर और पेपर लीक सिंडिकेट के खिलाफ मृत्युदंड जैसा कठोर कानून ही एकमात्र रास्ता है? आखिर कब तक युवा अपनी मेहनत की बलि चढ़ते रहेंगे?

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