आदिवासी बनाम वनवासी: राष्ट्रपति के संबोधन ने मध्यप्रदेश की राजनीति में फूँकी नई जान
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मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हालिया दौरे ने सूबे की राजनीति में आदिवासी बनाम वनवासी की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। महामहिम के संबोधन के बाद कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं, जहाँ एक ओर विपक्ष इसे अपनी वैचारिक जीत बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे संवैधानिक गरिमा से खिलवाड़ करार दे रहा है।

क्या है वनवासी शब्द पर विवाद? विवाद की शुरुआत बैतूल में राष्ट्रपति के उस संबोधन से हुई जिसमें उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय को भले ही लोग वनवासी कहें, लेकिन वे वास्तव में आदिवासी हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि अब खुद राष्ट्रपति ने भी मान लिया है कि भाजपा द्वारा आदिवासियों को वनवासी कहना उनके साथ अन्याय है। कांग्रेस का मानना है कि आदिवासी शब्द उनकी पहचान, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन के संवैधानिक अधिकारों का प्रतीक है।

जीतू पटवारी का सरकार पर बड़ा हमला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश के करीब डेढ़ करोड़ आदिवासियों की समस्याओं को रेखांकित किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में भाजपा नेताओं और उनके करीबी उद्योगपतियों द्वारा आदिवासियों की लगभग 1.26 लाख हेक्टेयर जमीन खरीदी गई है। पटवारी ने वादा किया कि 2028 में कांग्रेस की सरकार बनते ही इन सभी भूमि सौदों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।

शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा पर चिंता पत्र में पटवारी ने आदिवासी समाज के लिए शिक्षा की सुलभता, रिक्त बैकलॉग पदों को भरने और आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा व मानव तस्करी के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष का यह कर्तव्य है कि वह जनता और समाज के अधिकारों के लिए आवाज उठाए।

भाजपा का पलटवार: कांग्रेस कर रही राजनीति कांग्रेस के इन आरोपों पर राज्य के कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने कड़ा रुख अपनाया है। सारंग ने कहा कि राष्ट्रपति का दौरा आदिवासी कल्याण और सिकल सेल जैसी बीमारियों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक पहल है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वे संवैधानिक पदों की गरिमा को तार-तार कर रहे हैं और केवल भ्रम फैलाकर आदिवासी समाज के मुद्दों का राजनीतिकरण कर रहे हैं।

राजनीति का नया केंद्र बिंदु आदिवासी अस्मिता का मुद्दा मध्यप्रदेश की राजनीति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जहाँ कांग्रेस इस मुद्दे को अपनी वैचारिक धार देने के लिए इस्तेमाल कर रही है, वहीं भाजपा इसे आदिवासी विकास के अपने एजेंडे को भटकाने की साजिश मान रही है। आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज होने के संकेत हैं।

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