होर्मुज में अमेरिकी हमले से 3 भारतीय नाविकों की मौत: क्या अब क्वाड और भारत-अमेरिका दोस्ती सिर्फ कागजी है?
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वॉशिंगटन: ओमान के तट के पास होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई ने भारत और अमेरिका के संबंधों में एक गंभीर कड़वाहट घोल दी है। पिछले तीन दिनों में अमेरिकी हमलों का शिकार हुए दो जहाजों पर भारतीय चालक दल मौजूद थे, जिसमें से एक हमले में तीन भारतीय नाविकों की दर्दनाक मौत हो गई है।

हमले की भयावह सच्चाई बुधवार को अमेरिकी नौसेना ने भारतीय चालक दल वाले ऑइल टैंकर सेटेबेलो को निशाना बनाया। इस भीषण हमले में 23 वर्षीय नाविक आदित्य शर्मा समेत तीन भारतीयों की जान चली गई। इससे ठीक दो दिन पहले मैरीवेक्स नामक जहाज पर भी अमेरिकी हमला हुआ था। हालांकि, उस घटना में 24 भारतीय नाविक बाल-बाल बच गए थे।

नियमों की अनदेखी का आरोप फॉरवर्ड सीमेन्स यूनियन ऑफ इंडिया (FSUI) ने अमेरिका के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है कि जहाजों ने चेतावनी का पालन नहीं किया। यूनियन के जनरल सेक्रेटरी मनोज यादव का कहना है कि क्रू को कोई रेडियो चेतावनी नहीं दी गई थी। सीधे तौर पर व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।

ट्रंप प्रशासन का ढीठ रवैया हैरानी की बात यह है कि इन मौतों पर अमेरिका की ओर से कोई खेद व्यक्त नहीं किया गया है। इसके विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इन हमलों को अमेरिकी सेना की सफलता के रूप में पेश किया है। अमेरिका का यह अहंकार उस क्वाड सहयोग और रणनीतिक साझेदारी पर बड़े सवाल खड़े करता है, जिसका दम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देश भरते हैं।

भारत का कड़ा रुख और डेमार्श भारत ने इस मामले को उच्च स्तर पर उठाया है। बुधवार को भारत ने अमेरिकी चार्ज डी अफेयर्स जेसन मीक्स को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने इन हमलों पर गहरी चिंता जताई है। जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनेवाल ने नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भरोसा दिया है, लेकिन राजनयिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि क्या भारत-अमेरिका समझौते अब सिर्फ कागजी बनकर रह गए हैं।

अस्थिरता की ओर बढ़ते कदम विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह कार्रवाई न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि ईरान के आसपास नाकेबंदी की अमेरिकी रणनीति के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। जब रणनीतिक साझेदार ही ऐसे हमलों को सही ठहराने लगें, तो IFC-IOR और क्वाड जैसे सुरक्षा तंत्रों की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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