ओमान तट पर अमेरिकी हमला: भारतीय नाविकों की जान गई, दिल्ली ने जाहिर की नाराजगी
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ओमान के तट के पास बुधवार को अमेरिकी नौसेना द्वारा तेल टैंकर सेटेबेलो पर किए गए हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। इस सैन्य कार्रवाई में दो भारतीय नाविकों की मौत हो गई है, जबकि एक अन्य अभी भी लापता है।

हमले की पूरी कहानी अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया कि पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर सेटेबेलो ने ईरान से तेल ले जाकर अमेरिकी नाकाबंदी का उल्लंघन किया था। अमेरिकी सेना के अनुसार, बार-बार दी गई चेतावनियों के बावजूद जब चालक दल ने आदेश नहीं माना, तब एक अमेरिकी विमान ने प्रिसिजन म्यूनिशन्स (सटीक हथियारों) का इस्तेमाल कर जहाज के इंजन को निशाना बनाया।

भारत का कड़ा विरोध इस घटना पर भारत ने सख्त रुख अपनाते हुए नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के उप प्रमुख जेसन मीक्स को तलब किया और अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। हालांकि, सोमवार को हुई इसी तरह की एक अन्य घटना के उलट, भारत ने इस बार हमले की खुलकर निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि ओमान स्थित भारतीय दूतावास लगातार ओमानी अधिकारियों के संपर्क में है और बचाव अभियान की निगरानी कर रहा है।

तीन दिनों में दूसरा हमला यह चिंताजनक है कि केवल तीन दिनों के भीतर भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर यह दूसरा अमेरिकी हमला है। इससे पहले सोमवार को एमटी मैरीवेक्स को निशाना बनाया गया था। उस घटना में जहाज पर सवार 24 भारतीय नाविकों को ओमान की सेना ने सुरक्षित बचा लिया था। अमेरिका पहले ही इन जहाजों पर प्रतिबंध लगा चुका था।

क्षेत्रीय तनाव और अनिश्चितता यह घटना खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य टकराव का परिणाम है। 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद से समुद्री व्यापार मार्ग बेहद असुरक्षित हो गए हैं। मार्च में लेबनान और अन्य क्षेत्रों तक फैले इस संघर्ष ने समुद्री आवाजाही को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

नाविकों की सुरक्षा पर संकट भारतीय चालक दल वाले जहाजों को बार-बार निशाना बनाए जाने से विदेशी संघर्षों के बीच फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में कारोबारी जहाजों और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना तत्काल बंद होना चाहिए और समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही बहाल की जानी चाहिए।

वर्तमान में, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते अविश्वास के कारण युद्धविराम की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है, जिससे खाड़ी क्षेत्र में किसी भी समय बड़े सैन्य टकराव की आशंका बढ़ गई है।

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