भारत ने पाकिस्तान की आतंकी हरकतों के खिलाफ एक बड़ा स्टैंड लेते हुए सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर सख्त रुख अपना लिया है। प्रधानमंत्री मोदी के खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते वाले बयान के बाद से ही पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अब भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के एकतरफा फैसले को मानने से इनकार कर दिया है, जिससे इस्लामाबाद की बेचैनी बढ़ गई है।
विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पसरा सन्नाटा हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में एक पत्रकार ने तीखा सवाल पूछकर हड़कंप मचा दिया। पत्रकार ने पूछा, भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को ठुकरा दिया है, जिससे हमारा केस पूरी तरह अटक गया है। इस साल हमें भयंकर सूखे और फिर मानसून में तबाही वाली बाढ़ का सामना करना पड़ेगा। क्या हमारे पास भारत के खिलाफ कोई प्रभावी विकल्प या दबाव बनाने का जरिया बचा है? इस सवाल पर प्रवक्ता का चेहरा फीका पड़ गया और उनके पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था।
जून का जलजला और पाकिस्तान का पैनिक पाकिस्तान का डर इसलिए भी गहरा है क्योंकि जून के महीने के साथ ही वहां जल संकट का बुरा दौर शुरू होने वाला है। भारत द्वारा किशनगंगा और रतले जैसे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर काम तेज करने के बाद पाकिस्तान में पानी की किल्लत बढ़ गई है। वहीं, जब मानसून आता है, तो पाकिस्तान के पास पानी को सही तरीके से मैनेज करने के लिए कोई ढांचा (Infrastructure) मौजूद नहीं है, जिससे वहां बाढ़ का खतरा हर साल बना रहता है।
भारत का स्पष्ट संदेश: अब कोई तीसरा पक्ष नहीं भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान की शह पर काम करने वाले किसी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत या मध्यस्थता कोर्ट के एकतरफा फैसलों से बाध्य नहीं है। नई दिल्ली का रुख साफ है कि जल बंटवारे से जुड़े किसी भी मुद्दे पर चर्चा केवल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर ही होगी। भारत अब किसी भी तीसरे देश या संस्था की दखलअंदाजी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
आखिर क्या है सिंधु जल समझौता? साल 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलज का पानी भारत को मिला था, जबकि सिंधु, झेलम और चेनाब का पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया था। हालांकि, भारत को इन तीन पश्चिमी नदियों पर भी रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट्स के जरिए बिजली बनाने का पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त है। भारत अब इसी अधिकार का पूरी तरह उपयोग कर रहा है, जिससे पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा महसूस हो रहा है।
पाकिस्तान के पास न तो अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई सुनने वाला है, और न ही भारत पर दबाव बनाने की कोई आर्थिक क्षमता बची है। भारत की यह सख्ती पाकिस्तान के लिए एक दोहरी मार साबित हो रही है।
Tough question at Pakistan Foreign Ministry’s briefing
— Shashank Mattoo (@MattooShashank) May 22, 2026
“India has rejected the Court of Arbitration’s ruling on the Indus Waters Treaty. Pakistan’s case is stuck. We will face a water shortage. Soon rains will come & there will be destruction. Do we have any levers with India?” pic.twitter.com/VUvfSobQ4r
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