बड़े मंगल पर सियासी दर्शन : मंदिर और भंडारे के जरिए क्या संदेश दे रहे हैं राहुल-अखिलेश?
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उत्तर प्रदेश में इस बार बड़े मंगल का आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत जैसा दिखा। लखनऊ से लेकर रायबरेली तक, विपक्षी दिग्गजों की सक्रियता ने चुनावी सरगर्मियों को तेज कर दिया है।

रायबरेली में राहुल गांधी का हनुमान दर्शन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली के प्रसिद्ध चुरुवा हनुमान मंदिर पहुंचे। यहां उन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ बजरंगबली की पूजा-अर्चना की और देश-प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की।

राहुल के मंदिर पहुंचते ही वहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी की मंदिर यात्राएं अब केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं, जिसके जरिए वे जनता के बीच अपनी छवि को और अधिक सुलझा हुआ और सर्वस्वीकार्य बनाने में जुटे हैं।

लखनऊ में अखिलेश यादव का जनता दरबार दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लखनऊ के हजरतगंज में आयोजित बड़े मंगल के भंडारे में नजर आए। उन्होंने न केवल हनुमान जी की आरती की, बल्कि खुद श्रद्धालुओं को अपने हाथों से प्रसाद भी परोसा।

सबसे खास बात यह रही कि अखिलेश आम लोगों के साथ जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण करते दिखे। समर्थकों ने इस सादगी को जनता के बीच की राजनीति करार दिया है। वहीं, आलोचक इसे आगामी चुनाव से पहले हिंदू वोट बैंक को साधने की कवायद के रूप में देख रहे हैं।

धार्मिक आयोजनों पर क्यों है विपक्षी दलों की नजर? उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा की हिंदुत्ववादी विचारधारा लंबे समय से हावी रही है। ऐसे में बड़े मंगल जैसे आयोजनों में राहुल और अखिलेश का शामिल होना यह स्पष्ट संकेत देता है कि विपक्षी दल अब सॉफ्ट हिंदुत्व या धार्मिक-सांस्कृतिक भागीदारी के जरिए भाजपा के पिच पर ही मुकाबला करने की तैयारी कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में इन नेताओं की सक्रियता और बढ़ेगी। चुनाव से पहले जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए मंदिर, भंडारे और ऐसे अन्य आयोजन सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरे हैं।

क्या है बड़ा संकेत? अखिलेश यादव का प्रसाद बांटना हो या राहुल गांधी का मंदिर में पूजा करना, ये तस्वीरें महज इत्तेफाक नहीं हैं। यह स्पष्ट इशारा है कि विपक्षी दल अब अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलकर भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह धार्मिक-सियासी दांव कितना कारगर साबित होगा, यह देखना काफी दिलचस्प होगा।

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