CM विजय का तमिल कार्ड और कांग्रेस की दुविधा: क्या फिर जागृत हुआ प्रभाकरन का जिन्न ?
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भारतीय राजनीति में कुछ किरदार जिन्न की तरह होते हैं, जो बरसों बाद भी सियासत के गलियारों में अचानक प्रकट हो जाते हैं। तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री विजय थलापति द्वारा लिट्टे (LTTE) प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन को दी गई श्रद्धांजलि ने एक बार फिर दक्षिण की राजनीति में हलचल मचा दी है।

बीजेपी का कांग्रेस पर तीखा हमला इस घटना ने बीजेपी को कांग्रेस पर निशाना साधने का बड़ा मौका दे दिया है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा कि तमिलनाडु के सीएम ने उसी प्रभाकरन को नमन किया है, जिसने देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी।

मालवीय ने सीधे तौर पर कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए सत्ता की भागीदारी सिद्धांतों से ऊपर है, इसीलिए वे डीएमके जैसे दलों के साथ गठबंधन करने में कोई गुरेज नहीं करते, जिनका इतिहास लिट्टे समर्थक रहा है।

सीएम विजय का तमिल राष्ट्रवाद का दांव विजय थलापति ने हमेशा श्रीलंकाई तमिलों के हितों को अपनी राजनीति का केंद्र रखा है। वे ईलम तमिलों को अपना गर्भनाल से जुड़ा रिश्तेदार मानते हैं। उन्होंने द्रविड़ राजनीति और तमिल राष्ट्रवाद को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की दो आंखें करार दिया है।

प्रभाकरन की बरसी पर उन्होंने मुल्लिवैक्कल की यादों को संजोने की बात कही है। मुल्लिवैक्कल वही स्थान है, जहां 2009 में श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे का अंत किया था। विजय का यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वे तमिल अस्मिता को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाना चाहते हैं।

कांग्रेस की असहज स्थिति: माफी बनाम सियासत कांग्रेस के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। भले ही प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने अपने पिता के हत्यारों को सार्वजनिक रूप से माफ कर दिया हो और सोनिया गांधी ने नलिनी श्रीहरन की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलवाने की अपील की हो, लेकिन राजनीतिक मंच पर लिट्टे का महिमामंडन करना पार्टी के लिए एक वैचारिक संकट पैदा करता है।

क्या कांग्रेस के लिए अब चुनावी मजबूरियां गांधी परिवार के निजी त्याग और माफी के सिद्धांत पर भारी पड़ रही हैं? यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से उठ रहा है।

कौन था प्रभाकरन और क्यों गहरा है घाव? 1976 में प्रभाकरन ने अलग तमिल राष्ट्र की मांग के साथ लिट्टे की स्थापना की थी। इस संगठन ने श्रीलंका में एक समानांतर सेना खड़ी कर दी थी, जिसके पास उन्नत हथियार और विमान तक थे।

भारत के लिए यह जख्म 21 मई 1991 को गहरा हुआ, जब श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। 18 मई 2009 को श्रीलंकाई सेना के साथ हुई एक मुठभेड़ में प्रभाकरन मारा गया, लेकिन उसके विचार और स्मृति आज भी तमिलनाडु की जनभावनाओं और राजनीति के बीच एक ध्रुवीकरण का बिंदु बने हुए हैं।

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