बिहार: सहयोग शिविर में अधिकारियों की बेरुखी, फरियादी घंटों करते रहे इंतजार
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बिहार सरकार का महत्वाकांक्षी सहयोग शिविर अभियान पहले ही दिन सवालों के घेरे में आ गया है। सहरसा जिले के बनमा ईटहरी प्रखंड से सामने आई तस्वीरें सरकारी दावों की पोल खोल रही हैं।

घंटों तक फोन में व्यस्त रहे अधिकारी शिविर में अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर आए लोग सुबह 9:30 बजे से ही कतार में थे। लेकिन दोपहर 12:30 बजे तक न तो काम हुआ और न ही कोई सुनवाई। इस दौरान वहां मौजूद कई अधिकारी फाइलों के बजाय अपने मोबाइल फोन में व्यस्त नजर आए।

वरीय अफसरों के इंतजार में समय बर्बाद हैरानी की बात यह है कि जनता के काम का निपटारा करने के बजाय मौके पर मौजूद अधिकारी वरीय अधिकारियों के आने का इंतजार करते रहे। घंटों तक चली इस निष्क्रियता ने वहां मौजूद लोगों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया। लोगों ने सवाल उठाया है कि अगर अधिकारी कार्यस्थल पर गंभीर नहीं हैं, तो इस शिविर का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?

सीएम का कड़ा रुख और 30 दिन की डेडलाइन दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ने सोनपुर में इस अभियान की शुरुआत करते हुए बड़ा दावा किया था। उन्होंने कहा कि शिकायतों का समाधान सरकार की प्राथमिकता है और 30 दिनों के भीतर कार्रवाई न होने पर संबंधित अधिकारी को निलंबित कर दिया जाएगा। अब सहरसा की लापरवाही के बाद यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार अपने ही आदेशों का पालन सख्ती से करा पाती है।

क्या है सहयोग शिविर का एजेंडा? सरकार ने तय किया है कि हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को मंत्री अपने आवंटित जिलों में शिविर लगाएंगे। इसका मुख्य लक्ष्य पंचायत स्तर पर ही जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करना है। लेकिन पहले दिन की अव्यवस्था ने अभियान की गंभीरता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

किस मंत्री की जिम्मेदारी? सरकार ने मंत्रियों को अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारी सौंपी है ताकि सुशासन के दावों को धरातल पर उतारा जा सके। सहरसा जिले की जिम्मेदारी मिथिलेश तिवारी के पास है। अब जनता को उम्मीद है कि प्रशासन अपनी कार्यशैली में सुधार करेगा ताकि फाइलों के बोझ तले दबी समस्याएं केवल कागजों तक सीमित न रहें।

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