डॉलर हुआ ‘आउट’, पुतिन-जिनपिंग की नई चाल से दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव!
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बीजिंग में नई धुरी का उदय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के कुछ ही दिनों बाद, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन पहुंच रहे हैं। शी जिनपिंग के साथ उनकी यह मुलाकात वैश्विक राजनीति के केंद्र में मॉस्को-बीजिंग एक्सिस को मजबूती दे रही है। यह दौरा न केवल रणनीतिक मित्रता का प्रतीक है, बल्कि पश्चिमी देशों के लिए एक बड़ा संकेत भी है।

डॉलर को सीधी चुनौती रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में यूरोप के साथ होने वाले तेल और गैस सौदों में अमेरिकी डॉलर का उपयोग नहीं होगा। अब ये लेनदेन रूसी रूबल और चीनी युआन में किए जाएंगे। डॉलर की वैश्विक बादशाहत को चुनौती देने वाला यह कदम आर्थिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है।

डी-डॉलराइजेशन की हकीकत आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, रूस और चीन के बीच व्यापार लगभग पूरी तरह डी-डॉलराइज्ड हो चुका है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। साथ ही, दोनों राष्ट्रों ने वीजा-फ्री यात्रा व्यवस्था लागू कर आपसी नागरिक संबंधों को भी प्रगाढ़ किया है।

BRICS और नया विश्व क्रम पुतिन और शी जिनपिंग अपनी इस वार्ता में ऊर्जा सुरक्षा, BRICS और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के भविष्य पर चर्चा करेंगे। दोनों देश BRICS को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का आधार बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। पुतिन का तर्क है कि यह गठबंधन स्थिरता के लिए है, लेकिन पश्चिमी देशों की नजर में यह अमेरिकी प्रभाव को सीमित करने की एक सोची-समझी रणनीति है।

चीन की दोहरी कूटनीति विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन एक तरफ अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को अटूट कर रहा है। बीजिंग खुद को एक ऐसी वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश में है जो पश्चिम और रूस के बीच संतुलन बनाने की क्षमता रखती है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था ऊर्जा बाजार और भुगतान प्रणालियों में हो रहे ये बदलाव दुनिया को नए आर्थिक गुटों में धकेल रहे हैं। रूस-चीन की यह बढ़ती नजदीकी आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति और आर्थिक संतुलन को पूरी तरह बदल सकती है। यह गठबंधन अब महज एक सहयोग नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बन चुका है।

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