1000 साल बाद स्वदेश लौटी चोल गौरव की गाथा: नीदरलैंड ने लौटाईं 24 दुर्लभ कलाकृतियां
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ऐतिहासिक विरासत की घर वापसी भारतीय संस्कृति और इतिहास के लिए शनिवार का दिन एक गौरवशाली अध्याय लेकर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूरोपीय यात्रा के दौरान, नीदरलैंड ने 11वीं शताब्दी की 24 अत्यंत दुर्लभ चोलकालीन ताम्रपत्र कलाकृतियां भारत को सौंप दीं। ये कलाकृतियां लंबे समय से नीदरलैंड में थीं और इन्हें वापस लाने के लिए भारत लंबे समय से राजनयिक प्रयास कर रहा था।

क्या है इन ताम्रपत्रों का इतिहास? ये कलाकृतियां 11वीं सदी की हैं, जिन्हें डच ईस्ट इंडिया कंपनी लूटकर नीदरलैंड ले गई थी। तब से ये वहां के लीडेन विश्वविद्यालय में सुरक्षित थीं। इन्हें लीडेन प्लेट्स के नाम से भी जाना जाता है। 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटों के इस सेट का कुल वजन 30 किलोग्राम है। इन पर एक विशाल कांस्य छल्ला लगा है, जिस पर चोल राजा राजेंद्र प्रथम की शाही मुहर अंकित है।

तमिल और संस्कृत का अनूठा संगम इन ताम्रपत्रों पर लिखी इबारत इतिहास का जीवंत प्रमाण है। अधिकांश प्लेटों पर विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक, तमिल में लेख अंकित हैं, जबकि शुरुआती कुछ प्लेटों में संस्कृत का उपयोग किया गया है। ये प्लेटें चोल साम्राज्य के प्रशासन, भूमि अनुदान और उनकी भव्य वंशावली की जानकारी देती हैं।

पीएम मोदी ने जताई खुशी नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की उपस्थिति में आयोजित समारोह में हिस्सा लेते हुए पीएम मोदी ने इसे हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने एक्स पर लिखा, ये ताम्रपत्र महान राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता, राजा राजराजा प्रथम के वादे को औपचारिक रूप देने से संबंधित हैं। हम चोलों की समुद्री शक्ति और उनकी संस्कृति पर गर्व करते हैं।

भारत की समुद्री संस्कृति की पहचान चोल राजा केवल मंदिरों के निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अजेय नौसेना के लिए भी जाने जाते थे। इन्हीं की बदौलत भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का विस्तार थाईलैंड, इंडोनेशिया, लाओस और कंबोडिया जैसे देशों तक पहुंचा।

अब ASI की देखरेख में रहेंगी धरोहरें वर्ष 2012 से भारत इन कलाकृतियों की वापसी की मांग लगातार उठा रहा था। अब इन 30 किलो वजनी ताम्रपत्रों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपा जाएगा। भारतीय विशेषज्ञ इन्हें संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर के रूप में सहेजेंगे। इसे देश की सांस्कृतिक कूटनीति की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

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