पेट्रोल पंप विथ न्यूक्लियर वेपन्स : जो तंज कभी रूस के लिए था, आज अमेरिका पर क्यों भारी पड़ रहा है?
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अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्दों के बाण अक्सर हथियारों से ज्यादा चुभते हैं। दशकों तक अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को अपमानित करने के लिए एक जुमले का इस्तेमाल किया— पेट्रोल पंप विथ न्यूक्लियर वेपन्स । उनका दावा था कि रूस के पास तकनीक या नवाचार (Innovation) नहीं है, वह केवल जमीन से तेल और गैस निकालकर अपनी अर्थव्यवस्था चलाता है। लेकिन अब पहिया घूम चुका है।

अमेरिका पर कटाक्ष का नया दौर

कूटनीतिक मामलों के जानकार सुशांत सरीन ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि अब अमेरिका की स्थिति भी बदल गई है। इसे अमेरिका: पेट्रोल पंप विथ ग्रोसरी स्टोर्स एंड न्यूक्लियर वेपन्स के रूप में देखा जा रहा है। यानी, अब अमेरिका भी दुनिया को तेल, बीफ और बीन्स बेचने वाला देश बनकर रह गया है।

रूस के लिए क्यों बना था यह तंज?

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस भारी आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था। उस समय रूस की पूरी अर्थव्यवस्था केवल तेल, गैस और पुराने हथियारों पर टिकी थी। जब 2000 के दशक में व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस ने खुद को खड़ा किया, तो भी पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने इसे वन-ट्रिक इकॉनमी करार दिया। उनका तर्क था कि मॉस्को के पास एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट या सिलिकॉन वैली जैसा कुछ नहीं है, वह सिर्फ ऊर्जा के दम पर अपनी राजनीति चमका रहा है।

ऊर्जा का हथियार और राजनीति

पश्चिमी देशों के लिए रूस को नीचा दिखाना जरूरी था क्योंकि ऊर्जा ही रूस का सबसे बड़ा कूटनीतिक हथियार थी। जर्मनी जैसे देश रूसी गैस पर निर्भर थे, जिससे पुतिन यूरोप की राजनीति को प्रभावित करते थे। अमेरिका और यूरोप हमेशा रूस को यह बताने की कोशिश करते थे कि उसकी ताकत वास्तविक नहीं, बल्कि संयोगवश मिली हुई है।

अमेरिका खुद कैसे पेट्रोल पंप बन गया?

दुनिया के समीकरण बदले। 2010 के बाद अमेरिका में शेल ऑयल क्रांति आई, और वह दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल हो गया। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने रूसी ऊर्जा से दूरी बनाई, तो अमेरिका ने वहां अपनी LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) की सप्लाई बढ़ा दी।

आज स्थिति यह है कि अमेरिका की कंपनियां ऊर्जा से लेकर कृषि उत्पादों (बीफ, बीन्स) के निर्यात में जुटी हैं। जो अमेरिका कभी स्वयं के नवाचार और बैंकिंग पावर के लिए जाना जाता था, वह अब वैश्विक बाजार में एक कमोडिटी एक्सपोर्टर के तौर पर अपनी पहचान बना चुका है। यही कारण है कि आज दुनिया का यह ताना अमेरिका पर ही सटीक बैठ रहा है।

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