वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट: बुरा वक्त अभी बाकी है , तैयारी करने की चेतावनी
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दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं एक बड़े संकट की ओर बढ़ती दिख रही हैं। खाड़ी क्षेत्र और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जारी तनाव के कारण न केवल ईंधन की आपूर्ति बाधित हुई है, बल्कि वैश्विक स्तर पर महंगाई का खतरा भी गहरा गया है। सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने अपने देशवासियों को आगाह किया है कि यह संकट जल्द खत्म होने वाला नहीं है।

आर्थिक मंदी और स्टैगफ्लेशन का खतरा सिंगापुर के पीएम के अनुसार, इस संकट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह खाद्य पदार्थों और फर्टिलाइजर जैसी जरूरी चीजों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया कुछ देशों में मंदी और स्टैगफ्लेशन (महंगाई और सुस्त विकास का मिश्रण) की स्थिति देख सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे 1970 के दशक से भी अधिक गंभीर बताया है।

भारत पर महंगाई की मार भारत में भी इसके संकेत मिलने लगे हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.48% हो गई है, जो बीते चार महीनों का उच्चतम स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत की कमर तोड़ सकती हैं। मई में कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जबकि सरकार का अनुमान 77 डॉलर प्रति बैरल था। खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है।

अमेरिका में भी हाहाकार केवल एशिया ही नहीं, अमेरिका भी इस महंगाई की मार से अछूता नहीं है। वहां खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.8% तक पहुंच गई है, जो तीन साल का उच्चतम स्तर है। पेट्रोल और गैस की कीमतों में हो रही भारी बढ़ोतरी के कारण अमेरिकी उपभोक्ता भी राहत के इंतजार में हैं।

एशियाई विकास बैंक की बड़ी रिपोर्ट एशियाई विकास बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह संघर्ष एक साल से अधिक खिंचता है, तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक विकास दर में 1.3% की गिरावट आ सकती है और महंगाई में 3.2% की बढ़ोतरी संभव है। रिपोर्ट में सरकारों को सलाह दी गई है कि वे आम जनता को राहत देने के साथ-साथ ऊर्जा की बचत और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करें।

कैसे करें बचाव? संसाधनों के सीमित होने की संभावना को देखते हुए विशेषज्ञों ने कुछ सुझाव दिए हैं:

कुल मिलाकर, दुनिया एक कठिन दौर से गुजर रही है। पीएम मोदी और अन्य वैश्विक नेताओं के संकेतों से साफ है कि आने वाला समय आर्थिक अनुशासन और संयम की मांग करता है।

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