समंदर ही घर, समंदर ही जहान: मिलिए दुनिया की उस जनजाति से जो जमीन को नहीं जानती!
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क्या आप ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहाँ न कोई पक्का घर हो, न कोई देश और न ही जमीन से कोई रिश्ता? यह सुनने में किसी फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यह हकीकत है बजाऊ (Bajau) समुदाय की। इन्हें दुनिया का आखिरी समुद्री खानाबदोश कहा जाता है।

पानी पर जन्म, पानी पर ही अंतिम सफर बजाऊ जनजाति के लोग इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच फैले समुद्रों में रहते हैं। इनके लिए जमीन का कोई वजूद नहीं है। ये लोग या तो लकड़ी के उन घरों में रहते हैं जो पानी पर खंभों के सहारे टिके हैं, या फिर पूरी जिंदगी अपनी नावों पर ही बिता देते हैं। इनका जन्म नाव पर होता है और जीवन का हर पड़ाव पानी की लहरों के बीच ही गुजरता है।

बिना ऑक्सीजन के समुद्र की गहराइयों का सफर सोशल मीडिया पर इन दिनों इनका एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें ये लोग बिना किसी आधुनिक डाइविंग उपकरण या ऑक्सीजन सिलेंडर के समुद्र की अथाह गहराइयों में तैरते दिख रहे हैं। एक सामान्य इंसान के लिए जो काम नामुमकिन है, इनके लिए वह बेहद सहज है। ये लोग करीब 30 मीटर (100 फीट) से ज्यादा गहराई तक आसानी से गोता लगा सकते हैं।

पीढ़ी दर पीढ़ी आए शारीरिक बदलाव वैज्ञानिकों का मानना है कि हजारों सालों से समुद्र में रहने के कारण बजाऊ लोगों के शरीर में अद्भुत प्राकृतिक बदलाव आ गए हैं। इनकी आंखें पानी के भीतर भी बिल्कुल साफ देख सकती हैं, जबकि आम इंसान को वहां धुंधला नजर आता है। गोताखोरी इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है और बचपन से ही उन्हें समुद्र के रहस्यों को समझने की ट्रेनिंग दी जाती है।

कान के पर्दे और एक दर्दनाक सच्चाई इनकी जीवनशैली का एक हिस्सा बेहद चौंकाने वाला और दर्दनाक भी है। गहरे पानी के दबाव को झेलने के लिए कई बजाऊ लोग बचपन में ही अपने कान के पर्दे जानबूझकर क्षतिग्रस्त कर लेते हैं। इसका फायदा यह होता है कि उन्हें समुद्र की गहराई में जाने पर दबाव महसूस नहीं होता, लेकिन इसकी भारी कीमत उन्हें अपनी सुनने की क्षमता खोकर चुकानी पड़ती है।

नागरिकता और सीमाओं से परे बजाऊ समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका किसी देश या सीमा से कोई लेना-देना नहीं है। इनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं होती, क्योंकि वे किसी जमीन के टुकड़े पर नहीं, बल्कि खुले समंदर पर अपना अधिकार रखते हैं। ये सी-नोमैड्स (Sea Nomads) आज भी आधुनिक दुनिया की भागदौड़ से दूर, अपनी परंपराओं के साथ प्रकृति के बीच जी रहे हैं।

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