स्कूल ड्रेस के नाम पर लूट का अर्थशास्त्र : घटिया क्वालिटी, भारी दाम और स्कूलों की काली करतूत
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शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही है। अब किताबों के बाद यूनिफॉर्म स्कैंडल ने अभिभावकों की जेब पर बड़ा डाका डालना शुरू कर दिया है। स्कूल प्रशासन ने शिक्षा को व्यापार में बदल दिया है, जहाँ अभिभावकों को मजबूरी में लूट का शिकार होना पड़ रहा है।

एक ही फैक्ट्री, अलग-अलग दाम हैरानी की बात यह है कि बाजार में मिलने वाली यूनिफॉर्म और स्कूल द्वारा दी जाने वाली ड्रेस की मैन्युफैक्चरिंग एक ही जगह से होती है। फैक्ट्रियों में 300 से 900 रुपये की लागत में तैयार होने वाली यूनिफॉर्म को स्कूल अपने ब्रांड और खास मटेरियल के नाम पर कई गुना अधिक कीमत पर बेचते हैं।

क्या है स्कूलों की मोडस ऑपरेंडी ? स्कूलों ने लूट का एक खास चक्रव्यूह तैयार किया है। रिटेलर्स के मुताबिक, अधिकांश स्कूल जानबूझकर हर साल नए सेशन से पहले यूनिफॉर्म के डिजाइन या लोगो (Logo) में मामूली बदलाव कर देते हैं। इसका मकसद साफ है—बाजार में मौजूद सस्ती यूनिफॉर्म को चलन से बाहर करना और अभिभावकों को सिर्फ स्कूल के अधिकृत वेंडर से सामान खरीदने पर मजबूर करना।

क्वालिटी से समझौता, मुनाफे पर जोर मैन्युफैक्चरर्स का कहना है कि वे लागत में 25 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर वाजिब दाम पर ड्रेस देते हैं, लेकिन स्कूल प्रशासन कमीशन के चक्कर में घटिया क्वालिटी का कपड़ा चुनते हैं। अभिभावकों को यूनिक डिजाइन के नाम पर डराया जाता है ताकि वे बाहर से ड्रेस न खरीद सकें।

आपदा में अवसर तलाश रहे स्कूल स्कूल प्रशासन इस स्थिति का पूरा फायदा उठा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि हर साल थोपी जाने वाली नई ड्रेस उनके बजट पर भारी पड़ती है। स्कूल अपनी मनमर्जी से वेंडर तय करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और पेरेंट्स के पास लूटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

सरकार से हस्तक्षेप की मांग शिक्षा के नाम पर चल रहे इस धंधे के खिलाफ अब व्यापक विरोध के सुर उठ रहे हैं। अभिभावक और जागरूक नागरिक सरकार से मांग कर रहे हैं कि स्कूलों की इस यूनिफॉर्म मोनोपोली पर लगाम लगाई जाए। क्या शिक्षा के मंदिरों को कमाई का अड्डा बनने से रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा? यह बड़ा सवाल आज हर पेरेंट की जुबान पर है।

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