बंगाल चुनाव 2026: क्या EVM पर लगा इत्र तय करेगा वोटिंग का परिणाम? वायरल वीडियो ने बढ़ाई हलचल
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के माहौल के बीच एक कथित वीडियो ने सियासी पारा गरमा दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से साझा किए गए 19 सेकेंड के इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर खलबली मचा दी है। इसमें दावा किया गया है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने तानाशाही मॉडल के तहत EVM के साथ छेड़छाड़ कर रही है।

वीडियो में क्या है दावें? वीडियो में एक युवक दावा कर रहा है कि बंगाल के ग्रामीण इलाकों में EVM के खास बटनों पर इत्र लगाया जा रहा है। युवक के अनुसार, मतदान के बाद बूथ से बाहर निकलने वाले लोगों के हाथ सूंघे जाते हैं। यदि हाथ में इत्र की खुशबू नहीं आती है, तो उन्हें निशाना बनाया जाता है या मारपीट की जाती है। इस दावे ने सुरक्षा और निष्पक्ष चुनाव को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

सोशल मीडिया पर दो फाड़ हुई जनता इस ट्वीट को एक घंटे के भीतर 25,000 से अधिक बार देखा गया है। कमेंट बॉक्स में यूजर्स के बीच तीखी बहस छिड़ी है। जहां कुछ लोग इसे बंगाल में परिवर्तन की लहर बता रहे हैं, वहीं TMC समर्थकों ने इसे पूरी तरह फेक और बीजेपी का रोना-धोना करार दिया है। एक यूजर ने सलाह दी है कि वोटर वोट डालने के बाद ईवीएम पर उंगली रगड़कर इस डर से बच सकते हैं।

इत्र: नया चुनावी हथियार या महज अफवाह? राजनीतिक गलियारों में यह पहली बार है जब EVM हैकिंग या VVPAT के बजाय इत्र को चुनावी विवाद का केंद्र बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस अब बूथों से निकलकर आम जनता के बीच पहुंच गई है। यह नया सेंसर विवाद आने वाले समय में वोटर साइकोलॉजी को प्रभावित कर सकता है।

बीजेपी बनाम टीएमसी: ध्रुवीकरण अपने चरम पर बीजेपी इस मुद्दे को भुनाकर अपने वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश में है। हालांकि, TMC ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और वह चुप्पी साधे हुए है। जैसे-जैसे 2026 का चुनाव नजदीक आ रहा है, इत्र विवाद ने बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर दिया है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल सोशल मीडिया पर यूजर्स अब चुनाव आयोग (ECI) को टैग करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। हालांकि, वीडियो की सत्यता की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन इस कंट्रोवर्सी ने प्रशासनिक स्तर पर चिंताएं बढ़ा दी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह महज एक चुनावी प्रोपेगेंडा है या वाकई लोकतंत्र की सुरक्षा से जुड़ा कोई बड़ा खतरा।

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