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अटल जी की ये कविताएं हैं भारत की अनमोल धरोहर : Birthday Special News75

राजनीति के शिखर पुरुष आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी का जन्म दिन 25 दिसंबर को है | अटल जी राजनेता होने के साथ -साथ एक ओजस्वी कवि भी हैं , उनकी लिखी हुई कविताएं कभी मन में ज्वाला सा जोश भरती हैं, तो कभी गहन चिंतन को विवश कर देती हैं | कभी उनकी कविता में जीत का गौरव दिखता है , तो कभी उठ कर लड़ जाने का सन्देश | तो आइये उनके जन्मदिवस पर पढ़ते हैं उनके द्वारा लिखी गयी ऐसी दस कविताएं जो कभी निराशा नहीं होने देती:

1. हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है, कर लूं सब को गुलाम

मैंने तो सदा सिखाया है, करना अपने मन को गुलाम

गोपाल राम के नामों पर, कब मैंने अत्याचार किया

कब दुनिया को हिंदू करने, घर-घर मे नरसंहार किया

कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी

भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय

हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै एक बिंदु परिपूर्ण सिंधु है यह मेरा हिंदू समाज

मेरा इसका संबंध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज

इससे मैंने पाया तन-मन, इससे मैंने पाया जीवन

मेरा तो बस कर्त्तव्य यही, कर दूं सब कुछ इसके अर्पण

मैं तो समाज की थाति हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक

मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय

हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

2. आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अंधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें-

बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल

लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल

वतर्मान के मोहजाल में-

आने वाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज़्र बनाने-

नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

3. कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौन

कौन पांडव,

टेढ़ा सवाल है|

दोनों ओर शकुनि

का फैला

कूटजाल है|

धर्मराज ने छोड़ी नहीं

जुए की लत है|

हर पंचायत में

पांचाली

अपमानित है|

बिना कृष्ण के

आज

महाभारत होना है,

कोई राजा बने,

रंक को तो रोना है|

4. क़दम मिलाकर चलना होगा।

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

5. पुनः चमकेगा दिनकर।

आज़ादी का दिन मना,

नई ग़ुलामी बीच;

सूखी धरती, सूना अंबर,

मन-आंगन में कीच;

मन-आंगम में कीच,

कमल सारे मुरझाए;

एक-एक कर बुझे दीप,

अंधियारे छाए;

कह क़ैदी कबिराय

न अपना छोटा जी कर;

चीर निशा का वक्ष

पुनः चमकेगा दिनकर। आओ मन की गाँठें खोलें.

6. टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

सत्य का संघर्ष सत्ता से

न्याय लड़ता निरंकुशता से

अंधेरे ने दी चुनौती है

किरण अंतिम अस्त होती है

दीप निष्ठा का लिये निष्कंप

वज्र टूटे या उठे भूकंप

यह बराबर का नहीं है युद्ध

हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध

हर तरह के शस्त्र से है सज्ज

और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

किन्तु फिर भी जूझने का प्रण

अंगद ने बढ़ाया चरण

प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार

समर्पण की माँग अस्वीकार

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

7. अपने ही मन से कुछ बोलें!

क्या खोया, क्या पाया जग में

मिलते और बिछुड़ते मग में

मुझे किसी से नहीं शिकायत

यद्यपि छला गया पग-पग में

एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी

जीवन एक अनन्त कहानी

पर तन की अपनी सीमाएँ

यद्यपि सौ शरदों की वाणी

इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा

जीवन बंजारों का डेरा

आज यहाँ, कल कहाँ कूच है

कौन जानता किधर सवेरा

अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!

अपने ही मन से कुछ बोलें!

8. भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,

जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।

हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,

पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।

पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।

कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।

यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,

यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।

इसका कंकर-कंकर शंकर है,

इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।

हम जियेंगे तो इसके लिये

मरेंगे तो इसके लिये।

9. दूध में दरार पड़ गई

खून क्यों सफेद हो गया ?

भेद में अभेद खो गया |

बँट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई |

दूध में दरार पड़ गई |

खेतोँ में बारूदी गंध,

टुट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्याथित सी बितस्ता है |

वसंत से बहार झड़ गई

दूध में दरार पड़ गई |

अपनी ही छाया से बैर,

गले लगने लगे है गैर,

खुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता |

बात बनाएँ, बिगड़ गई |

दूध में दरार पड़ गई |

10. ‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

कर्तव्य के पुनीत पथ को

हमने स्वेद से सींचा है,

कभी-कभी अपने अश्रु और—

प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—

हम कभी रुके नहीं हैं।

किसी चुनौती के सम्मुख

कभी झुके नहीं हैं।

आज,

जब कि राष्ट्र-जीवन की

समस्त निधियाँ,

दाँव पर लगी हैं,

और,

एक घनीभूत अंधेरा—

हमारे जीवन के

सारे आलोक को

निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए

जीने, जूझने और

आवश्यकता पड़ने पर—

मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की

इस घड़ी में—

आइए, अर्जुन की तरह

उद्घोष करें :

‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

ये दस खूबियां बनाती हैं अटल जी को सबसे अलग - Birthday Special - News75

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