सड़क पर जनता, राष्ट्रपति की कुर्सी गई: क्या पैराग्वे का बैंकिंग संकट सत्ता बदलने की नई इबारत है?
News Image

दक्षिण अमेरिकी देश पैराग्वे इन दिनों भारी राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। देश के सबसे बड़े डिजिटल बैंक उएनो (Ueno) में वित्तीय अनियमितताओं के खुलासे के बाद वहां की स्थिति विस्फोटक हो गई है। केंद्रीय बैंक ने बैंक को अपने नियंत्रण में ले लिया है, जिसके चलते राष्ट्रपति सैंटियागो पेना पर महाभियोग का खतरा मंडरा रहा है और उनकी कुर्सी लगभग जा चुकी है।

इस बैंक में करीब 30 लाख ग्राहकों की 85 करोड़ डॉलर की जमा राशि फंसी है। आरोप है कि राष्ट्रपति ने अपने प्रभाव का गलत इस्तेमाल कर बैंक का दुरुपयोग किया, जिसके बाद जनता सड़कों पर है और आपराधिक जांच शुरू हो चुकी है।

जब बैंकिंग संकट ने हिलाईं सत्ता की नींव

पैराग्वे का यह मामला इतिहास में नजर आने वाले उन बैंकिंग संकटों की याद दिलाता है, जिन्होंने न केवल देशों की अर्थव्यवस्था को तबाह किया, बल्कि सरकारों को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

1. आइसलैंड (2008): यहां के बैंक देश की जीडीपी से कई गुना बड़े हो गए थे। संकट आने पर सरकार के पास इन्हें बचाने के लिए विदेशी मुद्रा कम पड़ गई। नतीजतन, सरकार को घरेलू जमाकर्ताओं को बचाने के लिए कड़े पूंजी नियंत्रण लागू करने पड़े और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद लेनी पड़ी।

2. साइप्रस (2013): यूरो क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण साइप्रस अपनी मुद्रा नहीं छाप सकता था। बैंकों के विफल होने पर लोगों के पैसे निकालने पर सीमा लगा दी गई, जिससे सरकार की साख पर गहरा बट्टा लगा और भारी जन आक्रोश फैला।

3. अमेरिका (2008): लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया होने से शुरू हुए संकट ने न केवल अमेरिका को मंदी में धकेला, बल्कि बेरोगजारी और घरों की कुर्की ने पूरी दुनिया में हाहाकार मचा दिया। इस संकट ने साबित किया कि एक बैंक की विफलता कैसे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को ढहा सकती है।

4. इंडोनेशिया (1997-98): एशियाई वित्तीय संकट के दौरान इंडोनेशिया में बैंकों के खराब कर्ज ने मुद्रा की कीमत गिरा दी। जनता के भरोसे को बहाल करने के लिए सरकार को न केवल कई बैंक बंद करने पड़े, बल्कि भारी राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा।

सबक: क्या सुधरेगी व्यवस्था?

इन वैश्विक उदाहरणों और पैराग्वे की वर्तमान स्थिति से कुछ कड़वे सबक मिलते हैं:

पैराग्वे में आज जो हो रहा है, वह सिर्फ एक बैंक का विफल होना नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि जब बैंकिंग तंत्र और राजनीति का अनैतिक गठजोड़ बनता है, तो उसका खामियाजा आम जनता को अपनी गाढ़ी कमाई खोकर भुगतना पड़ता है। अब देखना यह है कि पैराग्वे का सीनेट राष्ट्रपति के भविष्य पर क्या अंतिम निर्णय लेता है।

*

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

ये मेरा घर है : लालू यादव ने शहाबुद्दीन के घर पहुंचकर बदली सिवान की सियासी फिजा

Story 1

जम्मू-कश्मीर की सत्ता में बड़ी हलचल: क्या उमर अब्दुल्ला सरकार पर मंडरा रहा है संकट?

Story 1

IPL 2027: राजस्थान रॉयल्स और लखनऊ सुपर जायंट्स के बीच मेगा ट्रेड की तैयारी, बदल जाएगा टीमों का समीकरण

Story 1

नूडल्स के पैकेट में छिपाकर लाई गई 3.72 करोड़ की ड्रग्स, पुणे एयरपोर्ट पर यात्री गिरफ्तार

Story 1

नशे में लड़खड़ाई महिला, होटल की 7वीं मंजिल से गिरी; बॉयफ्रेंड देखता रह गया सन्न

Story 1

आधार नहीं अब वोटर कार्ड से मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ: राहुल गांधी ने इसे बताया गहरी साजिश

Story 1

निशा भगत की मौत: जयराम महतो ने खड़े किए तीखे सवाल, CBI जांच की मांग से गरमाई राजनीति

Story 1

शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की मुलाकात से सियासी पारा गर्म: 10 नवंबर के बाद करेंगे बात

Story 1

शुभमन गिल और पीवी सिंधु की कनपटी पर चिपका यह Temple आखिर है क्या? क्या वाकई यह दिमाग पढ़ सकता है?

Story 1

नेशनल कॉन्फ्रेंस की अग्निपरीक्षा : फारूक अब्दुल्ला ने थामी बगावत की डोर, क्या सुलझ गया अंदरूनी कलह?