दिल्ली की हवा सर्दियों में क्यों बन जाती है जहरीली? पांच बड़े कारण और हकीकत
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दिल्ली में सर्दियों की आहट के साथ ही हवा का स्तर तेजी से बिगड़ने लगता है। अक्टूबर के अंत में जहां AQI 117 था, वहीं कुछ ही दिनों में यह 300 के पार बहुत खराब श्रेणी में पहुंच गया। हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए GRAP-2 लागू कर दिया गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हर साल यह स्थिति क्यों बनती है?

1. तापमान प्रतिलोमन (Temperature Inversion)

सर्दियों में मौसम की एक प्राकृतिक स्थिति दिल्ली के लिए मुसीबत बन जाती है। तापमान प्रतिलोमन के कारण जमीन के पास की ठंडी हवा ऊपर नहीं उठ पाती। इसके चलते वाहनों, कारखानों और निर्माण कार्यों से निकला धुआं निचले वायुमंडल में ही फंस जाता है। धीमी हवा के कारण ये प्रदूषक कण कई दिनों तक दिल्ली की हवा में बने रहते हैं।

2. वाहनों का भारी उत्सर्जन

दिल्ली के प्रदूषण में लगभग 23 फीसदी हिस्सेदारी वाहनों की है। पेट्रोल-डीजल से चलने वाली गाड़ियों का धुआं पीएम 2.5 और अन्य जहरीले कणों को हवा में घोलता है। ट्रैफिक जाम के दौरान वाहनों का घंटों चालू रहना इस समस्या को और गंभीर बना देता है। हालांकि प्रशासन PUC जांच जैसी पाबंदियां लगाता है, लेकिन इनका असर तभी दिखता है जब नियम सख्ती से लागू हों।

3. पराली का शोर बनाम हकीकत

अक्सर दिल्ली के प्रदूषण के लिए पंजाब-हरियाणा की पराली को मुख्य दोषी माना जाता है। हालांकि, शोध बताते हैं कि वार्षिक औसत में पराली की हिस्सेदारी केवल 4 फीसदी के आसपास रहती है। नवंबर में यह प्रभाव कुछ समय के लिए जरूर बढ़ता है, लेकिन जब पराली जलना बंद हो जाती है, तब भी दिल्ली की हवा खराब रहती है। यह साबित करता है कि प्रदूषण के स्थानीय कारण ज्यादा घातक हैं।

4. कचरा, निर्माण और धूल का तांडव

दिल्ली में कचरा जलाना, लकड़ी का उपयोग और निर्माण गतिविधियां प्रदूषण का बड़ा जरिया हैं। रिसर्च के मुताबिक, इनका कुल योगदान लगभग 20 फीसदी है। इसके अलावा सड़कों पर उड़ती धूल (करीब 17 फीसदी) और कृषि से निकलने वाली अमोनिया (करीब 27 फीसदी) हवा के रसायनों के साथ मिलकर सूक्ष्म घातक कण बनाती हैं, जो सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

5. सरकारी प्रयासों की कमी और अधूरे समाधान

पर्यावरण जानकारों का मानना है कि केवल GRAP लागू करना या प्रदूषण बढ़ने पर सड़कों पर पानी छिड़कना सीमित समाधान है। समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन की है। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के नियम हों या कचरा जलाने पर रोक, धरातल पर इनका पालन अधूरा रहता है।

साफ हवा हासिल करने के लिए केवल सर्दियों में सक्रिय होने के बजाय, दिल्ली समेत एनसीआर के सभी राज्यों को साल भर औद्योगिक उत्सर्जन, ट्रैफिक मैनेजमेंट और धूल नियंत्रण पर मिलकर काम करने की जरूरत है।

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