‘मुसलमान पढ़ना नहीं चाहते’ कहने वालों को ओवैसी का करारा जवाब, कहा- विलेन तो गरीबी है
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एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने देश में मुस्लिम समुदाय की शिक्षा के गिरते स्तर और उससे जुड़े मिथकों पर तीखा हमला बोला है। हैदराबाद में स्कूल प्रिंसिपल्स और शिक्षकों को संबोधित करते हुए ओवैसी ने साफ कहा कि मुस्लिम बच्चे अपनी मर्जी से स्कूल नहीं छोड़ते, बल्कि इसके पीछे गरीबी और सरकारी सिस्टम की नाकामी मुख्य कारण है।

सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं? ओवैसी ने सरकार के पुराने डेटा का हवाला देते हुए बताया कि मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक स्थिति काफी चिंताजनक रही है। 2014 के सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, 15 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे कभी स्कूल ही नहीं गए। वहीं, 2006 के आंकड़ों में मुस्लिम बच्चों के स्कूल में बिताए गए औसत समय को सबसे कम—केवल तीन साल और चार महीने—दर्ज किया गया था।

नोवेयर चिल्ड्रन और ड्रॉपआउट का संकट ओवैसी ने एक और गंभीर समस्या की ओर इशारा किया, जिसे नोवेयर चिल्ड्रन कहा जाता है। इसमें वे बच्चे आते हैं जो न तो स्कूल गए और न ही किसी रोजगार का हिस्सा बने। 2014 के सरकारी आंकड़ों में इस श्रेणी में मुसलमानों का हिस्सा सबसे ज्यादा 29 प्रतिशत पाया गया। इसके अलावा, 10 साल की उम्र से शुरू होने वाला ड्रॉपआउट रेट मुसलमानों में 82 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जो अन्य समुदायों की तुलना में सबसे अधिक है।

मिथक पर लगा विराम: 10वीं के रिजल्ट का सच ओवैसी ने उन लोगों पर निशाना साधा जो अक्सर यह दावा करते हैं कि मुसलमान पढ़ना नहीं चाहते। शिक्षा मंत्रालय के UDISE डेटा का हवाला देकर उन्होंने बताया कि कक्षा 10वीं में अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या 2020-21 में 14.5 प्रतिशत थी, जो 2021-22 में बढ़कर 24.4 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने इसे आलोचना करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा करार दिया।

AIMIM का शैक्षिक हस्तक्षेप ओवैसी ने बताया कि उनकी पार्टी ने अक्टूबर 2005 से नवंबर 2026 तक सरकारी उर्दू-मीडियम मदरसों और स्कूलों पर 10 करोड़ 47 लाख 11 हजार रुपये खर्च किए हैं, जिससे करीब 4 लाख छात्र लाभान्वित हुए हैं।

इस साल भी पार्टी 92 स्कूलों के 1,614 छात्रों की एसएससी (SSC) परीक्षा फीस खुद भरेगी। इसके अलावा, जुलाई और सितंबर 2026 में ट्रस्ट के माध्यम से हजारों छात्रों को एजुकेशनल किट वितरित की गई हैं ताकि आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई न रुके।

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