दो बच्चों की नीति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल: क्या अब पंचायत चुनाव का नियम बदलेगा?
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महाराष्ट्र में पंचायत चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए दो बच्चों की शर्त अब एक बड़े कानूनी विवाद में फंस गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के संकेत दिए हैं, जिससे महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है।

मामला क्या है? यह कानूनी लड़ाई महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले ने शुरू की है। उन्हें तीसरी संतान होने के कारण महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया था। यह कानून 13 सितंबर 2000 से प्रभावी है, जिसके तहत दो से अधिक बच्चे होने पर कोई भी व्यक्ति ग्राम पंचायत सदस्य बनने के योग्य नहीं रहता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल? अदालत ने देश में गिरती प्रजनन दर (Fertility Rate) पर चिंता जताते हुए इस पुराने नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट के अनुसार, भारत की प्रजनन दर 2003 में 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 की रिप्लेसमेंट दर से भी कम है, जो आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी होती है।

क्या कानून को चुनौती देना आसान होगा? याचिकाकर्ता के वकील प्रतीक बोंबर्डे के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों का उदाहरण दिया है जिन्होंने यह कठोर शर्त पहले ही हटा दी है। बोंबर्डे का कहना है कि अब महाराष्ट्र सरकार के पास दो विकल्प हैं: या तो राज्य सरकार खुद इस कानून में बदलाव करे, या फिर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के सामने इस कानून के पक्ष में ठोस दलीलें पेश करे।

नजरें अब बड़ी पीठ पर सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले के फैसले पर भी पुनर्विचार की बात कही है। उसी फैसले ने दो बच्चों की शर्त को वैध ठहराया था। अब इस पूरे मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजा गया है। यदि अदालत इस पर कोई नया रुख अपनाती है, तो यह न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के पंचायत कानूनों पर गहरा प्रभाव डालेगा।

आगे क्या होगा? यह कानूनी लड़ाई अब इस बात पर केंद्रित है कि क्या बदलती जनसांख्यिकी (Demographics) के दौर में दो बच्चों की नीति अभी भी लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने का वैध आधार हो सकती है? महाराष्ट्र सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

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