चक्रवात मुरासु का खतरा: बंगाल की खाड़ी में ही सबसे ज्यादा तूफान क्यों पनपते हैं?
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बंगाल की खाड़ी एक बार फिर भीषण चक्रवाती तूफान मुरासु (Murasu) की चपेट में है। अर्नब के बाद महज एक हफ्ते के भीतर आया यह दूसरा बड़ा तूफान है। मौसम विभाग के अनुसार, 2 नवंबर की रात यह 125-135 किमी/घंटा की रफ्तार से आंध्र प्रदेश के तट से टकरा सकता है। भारी बारिश और तेज हवाओं के चलते ओडिशा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु समेत कई राज्यों में हाई अलर्ट जारी किया गया है।

आखिर चक्रवात कैसे बनता है?

चक्रवात समुद्र के गर्म पानी के ऊपर बनने वाला बादलों और हवा का एक विशाल चक्रवात है। इसकी प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है:

  1. कम वायुदाब: समुद्र के एक छोटे क्षेत्र में हवा गर्म होकर ऊपर उठती है, जिससे वहां कम दबाव का क्षेत्र बनता है।
  2. ऊर्जा का संचार: समुद्र का पानी कम से कम 26.5°C गर्म होना चाहिए। यह गर्म पानी भाप बनकर ऊपर उठता है और बादलों में बदल जाता है, जिससे तूफान को ऊर्जा मिलती है।
  3. शांत ऊपरी हवाएं: चक्रवात के पनपने के लिए विंड शियर (ऊपरी हवाओं का तेज बहाव) का कम होना जरूरी है। यदि ऊपरी हवाएं शांत न हों, तो वे विकसित होते तूफान को बिखर देती हैं।

बंगाल की खाड़ी: चक्रवातों का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट

आंकड़े बताते हैं कि अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में चार गुना अधिक चक्रवात आते हैं। इसके तीन मुख्य कारण हैं:

मानसून के बाद क्यों बढ़ जाती है चक्रवात की तीव्रता?

अक्टूबर-नवंबर के महीनों में चक्रवात सबसे अधिक सक्रिय होते हैं। इसका बड़ा कारण मानसून के दौरान समुद्र की सतह पर बनने वाली मीठे पानी की परत है। मानसून की भारी बारिश और नदियों के पानी से बनी यह परत समुद्र की गर्मी को नीचे ही रोक लेती है।

इसके अलावा, सामान्य समुद्री स्थिति में तेज हवाएं नीचे के ठंडे पानी को ऊपर ले आती हैं जिससे तूफान कमजोर पड़ जाता है। लेकिन बंगाल की खाड़ी में मीठे पानी की यह परत गहरे ठंडे पानी को ऊपर आने से रोकती है, जिससे सतह का तापमान 28°C से ऊपर बना रहता है और तूफान को लगातार ऊर्जा मिलती रहती है।

बदलती जलवायु और बढ़ता खतरा

जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिखाई दे रहा है। शोध बताते हैं कि 2001 से 2019 के बीच समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से अरब सागर में चक्रवातों की संख्या में 52% की वृद्धि हुई है। हालांकि, बंगाल की खाड़ी अब भी चक्रवातों का मुख्य केंद्र बनी हुई है। इन बदलती मौसमी स्थितियों को देखते हुए तटीय राज्यों को अब और अधिक सतर्क और तैयार रहने की आवश्यकता है।

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