मौसम की मार या लाइमलाइट छिनने का डर, इंडी गठबंधन ने आखिर क्यों टाल दिया अपना शक्ति प्रदर्शन?
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राजनीति में मौसम वैज्ञानिक वे नेता होते हैं जो आने वाले सियासी हवाओं के रुख को पहले ही भांप लेते हैं। लेकिन शुक्रवार को दिल्ली में जो हुआ, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या इंडिया गठबंधन का शक्ति प्रदर्शन वाकई खराब मौसम की भेंट चढ़ा, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है?

मॉक पार्लियामेंट पर पानी: कुदरत या सियासत?

शुक्रवार को कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मॉक पार्लियामेंट (जन-महाभियोग) का आयोजन किया था। मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर होने वाले इस कार्यक्रम में राहुल गांधी समेत 21 दलों के 30 नेताओं को अपनी बात रखनी थी। लेक‍िन ऐन वक्त पर इसे टाल दिया गया। तर्क दिया गया कि दिल्ली में बारिश और खराब मौसम के कारण ये संभव नहीं है।

क्या बड़े चेहरों की गैर-मौजूदगी बना कारण?

सवाल यह है कि क्या सिर्फ खराब मौसम ही एकमात्र समस्या थी? जब राहुल गांधी कार्यक्रम टलने की जानकारी देने आए, तो ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और शरद पवार जैसे दिग्गजों की अनुपस्थिति साफ दिख रही थी। कार्यक्रम का प्रचार कई दिनों से हो रहा था, फिर भी बड़े विपक्षी नेता दिल्ली न पहुंच सके। क्या गठबंधन के अंदर इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं थी?

लाइमलाइट की होड़: पीएम और अमित शाह का दबदबा

राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि विपक्षी रणनीतिकार यह समझ गए थे कि आज उन्हें मीडिया की वह जगह नहीं मिल पाएगी जिसकी उन्हें दरकार थी।

आज ही गुजरात के बनासकांठा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों के बीच थे और उधर लखनऊ में गृहमंत्री अमित शाह बीजेपी की महत्वपूर्ण बैठक कर रहे थे। इन बड़े आयोजनों के बीच मॉक पार्लियामेंट कहीं हाशिए पर न चला जाए, इस डर ने भी कार्यक्रम को आगे खिसकाने में भूमिका निभाई हो सकती है।

1 नवंबर की रैली और गठबंधन का अजीब गणित

इंडिया गठबंधन अब अपनी पूरी ऊर्जा 1 नवंबर की वोट बचाओ-देश बचाओ रैली पर लगा रहा है। लेकिन यहाँ भी सब कुछ सामान्य नहीं है। आम आदमी पार्टी इस रैली से दूर है, वहीं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का समर्थन तो है, लेकिन कांग्रेस ने उनके नेताओं को मंच साझा करने की अनुमति नहीं दी है।

कांग्रेस इस मुद्दे पर किसी भी तरह की साझेदारी नहीं चाहती और अपना पूरा नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। पंजाब चुनाव के समीकरणों के बीच नेताओं की यह दूरी और मंच पर नो एंट्री का ऐलान, गठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

निष्कर्ष: क्या आधी-अधूरी तैयारी पर भारी पड़ रही बीजेपी?

राजनीति में पीछे हटना अक्सर घातक होता है, खासकर जब आप सरकार को घेरने के लिए बड़े मंच की तैयारी कर रहे हों। बंद कमरों या इंडोर स्टेडियम का विकल्प होने के बावजूद कार्यक्रम टालना यह दर्शाता है कि विपक्ष का मूवमेंटम अभी भी बिखरा हुआ है। दूसरी ओर, बीजेपी हर मौसम—चाहे वह चुनावी हो या प्राकृतिक—में अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने की जो कला जानती है, इंडिया गठबंधन फिलहाल उससे मीलों दूर नजर आ रहा है।

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