मतदाता सूची पुनरीक्षण पर संग्राम: दिल्ली में प्रदर्शनकारियों का चुनाव आयोग तक मार्च, CEC के इस्तीफे की मांग
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दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को पीपुल अगेंस्ट SIR के बैनर तले किसान संगठनों, छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर कूच किया। इस दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कई प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया।

हर गली में जंतर-मंतर का आह्वान

अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर ने सोशल मीडिया पर इस आंदोलन को गति देते हुए हर गली में जंतर-मंतर का नारा दिया है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मंच का दावा है कि देश के 300 से अधिक संगठन इस अभियान से जुड़ चुके हैं। इस आंदोलन में AISA और SFI जैसे कई प्रमुख छात्र और सामाजिक संगठन शामिल हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चा

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं। उनका दावा है कि देशभर में करीब 13.41 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

दिल्ली में सुरक्षा का कड़ा पहरा

आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए गृह मंत्रालय ने दिल्ली में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की 273 कंपनियों की तैनाती 31 अक्टूबर तक बढ़ा दी है। राजधानी में प्रदर्शनों की आशंका के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है। यह सुरक्षा तैनाती बढ़ाने का दूसरा मौका है।

संयुक्त किसान मोर्चा की तीन बड़ी मांगें

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक ज्ञापन भेजने की तैयारी की है। उनकी तीन प्रमुख मांगें हैं:

  1. SIR प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
  2. जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनके मतदान अधिकार बहाल किए जाएं।
  3. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाकर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।

राष्ट्रव्यापी आंदोलन की तैयारी

यह विरोध प्रदर्शन केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहने वाला है। पीपुल अगेंस्ट SIR और किसान संगठनों ने अब इस मुद्दे को देशव्यापी बनाने का आह्वान किया है। अन्य राज्यों में भी किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एकजुट होने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे आने वाले दिनों में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर राजनीतिक और सामाजिक बहस और तेज होने के आसार हैं।

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