दिल्ली की हवा जहरीली , बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप को आईना दिखाया
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नई दिल्ली/बर्लिन: एक तरफ दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ जर्मनी के दौरे पर गए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कार्बन उत्सर्जन को लेकर यूरोप को कटघरे में खड़ा कर दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देश जिम्मेदार हैं, वे भारत पर नियमों का बोझ नहीं डाल सकते।

यूरोप पर पीयूष गोयल का तीखा हमला बर्लिन में एक कार्यक्रम के दौरान पीयूष गोयल ने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर यूरोप की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दुनिया की 17% आबादी भारत में है, लेकिन वैश्विक उत्सर्जन में हमारी हिस्सेदारी 3% से भी कम है। इसके विपरीत, यूरोप की आबादी महज 3-4% है, फिर भी वहां का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत से कई गुना अधिक है।

ऐतिहासिक जिम्मेदारी का मुद्दा गोयल ने सवाल किया कि ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने और वायुमंडल में भारी मात्रा में कार्बन छोड़ने का काम किसने किया? उन्होंने तर्क दिया कि विकसित देशों ने अपने औद्योगिक विकास के दौरान जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध इस्तेमाल किया। अब जब जलवायु संकट गहरा गया है, तो वे विकासशील देशों की ऊर्जा और बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

यूरोपीय संघ के नियमों पर भारत की चिंता मंत्री का यह बयान यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था (CBAM) को लेकर भारत की चिंताओं के बीच आया है। यह व्यवस्था आयातित उत्पादों (जैसे लोहा, स्टील, एल्युमिनियम) पर अतिरिक्त टैक्स लगाती है। भारत को डर है कि इससे यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे, जिससे निर्यात और घरेलू उद्योगों पर बुरा असर पड़ेगा।

दिल्ली की फिजा में घुला जहर इधर, दिल्ली-एनसीआर की हवा फिर से खराब श्रेणी में पहुंच गई है। शुक्रवार को दिल्ली का एयरक्यूआई (AQI) 230 के पार दर्ज किया गया। जहांगीरपुरी और चांदनी चौक जैसे इलाकों में स्थिति बेहद खराब हो गई है। प्रदूषण पर काबू पाने के लिए सरकार ने GRAP-1 लागू कर दिया है, जिसके तहत निर्माण कार्यों और खुले में कचरा जलाने पर सख्ती बढ़ा दी गई है।

संतुलन की चुनौती भारत के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ अपनी 1.4 अरब आबादी के आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना, और दूसरी तरफ पर्यावरण को स्वच्छ रखना। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन पर भारत का रुख स्पष्ट है: विकासशील देशों को स्वच्छ तकनीकों के लिए आर्थिक मदद मिलनी चाहिए, न कि उन पर विकास को रोकने वाले नियम थोपे जाने चाहिए।

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