जलवायु परिवर्तन पर यूरोप का दोहरा रवैया: पीयूष गोयल ने कहा- समस्या आपने पैदा की, अब जिम्मेदारी उठाओ
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बर्लिन: भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान विकसित देशों, विशेषकर यूरोप को जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कड़े शब्दों में घेरा। गोयल ने स्पष्ट कहा कि आज दुनिया जिस जलवायु संकट का सामना कर रही है, उसकी नींव दशकों पहले विकसित देशों द्वारा किए गए अनियंत्रित औद्योगिक विकास ने रखी थी।

ऐतिहासिक जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे विकसित देश?

गोयल ने सवाल किया कि ओजोन परत को नुकसान किसने पहुंचाया और वातावरण में सबसे ज्यादा कार्बन का उत्सर्जन किसने किया? उन्होंने कहा कि जिन्होंने अपनी समृद्धि के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया, वे अब विकासशील देशों पर व्यापारिक पाबंदियों और अतिरिक्त खर्चों का बोझ डाल रहे हैं। मंत्री ने जोर देकर कहा कि विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करना चाहिए।

100 अरब डॉलर का वादा, 11 साल बाद भी खाली हाथ

जलवायु वित्तपोषण पर नाराजगी जाहिर करते हुए गोयल ने कहा कि 2009 में विकसित देशों ने विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, 11 साल बीतने के बाद भी हमें इसका एक पैसा तक नहीं मिला। ये केवल खोखले वादे साबित हुए हैं। यह सहायता विकासशील देशों के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों में अनिवार्य थी।

यूरोप खुद को ही दे रहा है आर्थिक संकट का न्योता

यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था (CBAM) पर निशाना साधते हुए गोयल ने चेतावनी दी कि ये नियम यूरोप की अपनी अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकते हैं। उन्होंने कहा, आप स्टील पर भारी आयात शुल्क लगाकर और नए-नए नियम थोपकर अपने ही उद्योगों को कमजोर कर रहे हैं। उनके अनुसार, इससे यूरोप में निर्माण लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर वहां की बुनियादी परियोजनाओं और आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।

भारत का रुख: विकास और पर्यावरण में संतुलन

अपनी बात रखते हुए पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा, भोजन और सुरक्षा की जरूरतों के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक चला रहा है, लेकिन यह विकास की कीमत पर नहीं हो सकता। अंत में उन्होंने दोहराया कि व्यापारिक समझौते केवल तभी सफल होंगे जब वे निष्पक्ष और संतुलित होंगे। एकतरफा पाबंदियां केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाएंगी।

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