सुप्रीम कोर्ट ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए सीजेपी (CJP) प्रदर्शन के दौरान जनता को हुई परेशानियों और पुलिस कार्रवाई को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस, भारतीय रेलवे और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
अवमानना की कार्रवाई का डर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष बेंच ने इन अधिकारियों से पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए। कोर्ट ने अधिकारियों को अपना जवाब हलफनामे के जरिए दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।
बैरिकेड्स हटाने और सेवाएं बहाल करने का निर्देश सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि पूरी दिल्ली से अनावश्यक बैरिकेड्स हटाए जाएं। इसके साथ ही, इंटरनेट सेवाओं को सुचारू रखने और मेट्रो व रेल सेवाओं को सामान्य रूप से संचालित करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सामान्य जनजीवन को बाधित नहीं किया जा सकता।
45 मेट्रो स्टेशनों पर सवाल दिल्ली मेट्रो की बंदी पर भी कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि दिल्ली के 303 स्टेशनों में से 45 पर पाबंदी लगाई गई थी। इस पर कोर्ट ने DMRC से उन स्टेशनों का नक्शा और पूरा विवरण मांगा है। कोर्ट यह समझना चाहती है कि किन आधारों पर स्टेशनों को बंद करने का निर्णय लिया गया था।
बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत नहीं प्रदर्शनकारियों और वकीलों की हिरासत और मारपीट के आरोपों पर कोर्ट ने कड़ी चेतावनी दी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून द्वारा तय प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी को भी हिरासत में नहीं लिया जा सकता। यदि लोग शांतिपूर्ण तरीके से जमा हुए हैं और वहां धारा 163 लागू नहीं है, तो पुलिस बल का प्रयोग अनुचित है।
क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के 5 अहम निर्देश?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने नोटिस जारी करने पर आपत्ति जताई, लेकिन न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि कारण बताओ और अवमानना नोटिस के बीच कानूनी अंतर होता है और यह कदम कोर्ट के पिछले आदेशों के उल्लंघन के मद्देनजर उठाया गया है।
Supreme Court Sunday hearing: Key takeaways#SupremeCourt directed that:
— Bar and Bench (@barandbench) October 11, 2026
• Delhi Metro and railway services must operate normally. Restrictions are permissible only when justified under Article 19(2).
• Internet services must remain available in accordance with law, without… pic.twitter.com/hdCWh32pkU
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