चुनाव प्रणाली पर उठे सवालों के बीच 124 पूर्व अफसरों का खुला पत्र, निर्वाचन आयोग के समर्थन में उतरे दिग्गज
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नई दिल्ली: हाल ही में चुनाव प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग (EC) की विश्वसनीयता पर उठते सवालों के बीच 124 पूर्व आईएएस (IAS) और आईएफएस (IFS) अधिकारियों ने देश के नागरिकों को एक खुला पत्र लिखा है। इन रिटायर अधिकारियों ने चुनाव प्रणाली का मजबूती से बचाव किया है।

सुरक्षा का अभेद्य चक्र पत्र में पूर्व अधिकारियों ने कहा है कि भारत की मौजूदा चुनाव व्यवस्था बहुस्तरीय सुरक्षा और पारदर्शिता के मानकों पर खरी उतरती है। मतदान केंद्रों पर एजेंटों की मौजूदगी, ईवीएम (EVM) की सीलिंग, स्ट्रांग रूम की निगरानी और वीवीपैट (VVPAT) के जरिए सत्यापन की प्रक्रिया इसे पूरी तरह सुरक्षित बनाती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अब वह दौर पीछे छूट चुका है जब मतदान केंद्रों पर कब्जे या फर्जी मतपत्र डालने जैसी घटनाएं आम थीं। आज की व्यवस्था किसी भी गड़बड़ी को रोकने में पूरी तरह सक्षम है।

बिहार चुनाव का दिया उदाहरण पूर्व नौकरशाहों ने अपने दावे की पुष्टि के लिए बिहार विधानसभा चुनाव का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इस चुनाव में एक भी बूथ पर पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी और 1951 के बाद से सबसे अधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया।

उन्होंने उन लोगों की कड़ी आलोचना की जो केवल नतीजों के आधार पर चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं। पत्र में तीखे शब्दों में कहा गया कि यह दोहरा मापदंड अस्वीकार्य है कि जीत मिलने पर प्रणाली ईमानदार और हारने पर उसी में धांधली का आरोप लगाया जाए।

सत्ता पक्ष की हार को बताया सबूत अधिकारियों ने तर्क दिया कि इसी निर्वाचन आयोग के कार्यकाल में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है। साथ ही, 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी अपने दम पर बहुमत तक नहीं पहुंच सकी। यह स्पष्ट करता है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष है।

दिग्गज अधिकारियों का समर्थन इस महत्वपूर्ण पत्र पर देश के कई वरिष्ठ पूर्व अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, आर. डी. कपूर, समीरेंद्र चटर्जी और नवनीत सहगल जैसे नाम शामिल हैं।

इन अफसरों ने जोर देकर कहा कि चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाने के लिए केवल बयानबाजी काफी नहीं, इसके लिए ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है। बता दें कि इसी तरह का समर्थन हाल ही में 42 पूर्व जजों ने भी दिया है, जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए अपना रुख स्पष्ट किया है।

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